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देहरादून पानी की टंकी पर चढ़े उत्तराखंड बेरोज़गार नर्सिंग संघ के आन्दोलन कारी,158 दिनों से नियुक्त की कर रहे मांग

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 देहरादून पानी की टंकी पर चढ़े उत्तराखंड बेरोज़गार नर्सिंग संघ के आन्दोलन कारी,158 दिनों से नियुक्त की कर रहे मांग

देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आज एक बार फिर  तनाव और नारों की गूँज से दहल उठी है। पिछले 158 दिनों से अपनी जायज मांगों को लेकर सड़कों पर बैठे नर्सिंग बेरोजगारों का धैर्य आज जवाब दे गया। नर्सिंग एकता मंच के बैनर तले चल रहा यह आंदोलन उस समय बेहद नाटकीय और चिंताजनक मोड़ पर पहुँच गया, जब कई प्रदर्शनकारी अपनी मांगों के समर्थन में परेड ग्राउंड स्थित पानी की टंकी पर चढ़ गए।

​हाथों में बैनर-पोस्टर लिए और गले में न्याय की उम्मीद सँजोए ये युवा अब “आर-पार” की लड़ाई का मन बना चुके हैं। मौके पर  पुलिस बल तैनात है और प्रशासन के हाथ-पांव फूले हुए हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी नीचे उतरने को तैयार नहीं हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि अब आश्वासन नहीं, सीधा नियुक्ति पत्र चाहिए।

आमरण अनशन का 23वां दिन:

​जहाँ एक तरफ पानी की टंकी पर हाई-वोल्टेज ड्रामा चल रहा है, वहीं दूसरी ओर आमरण अनशन पर बैठे अभ्यर्थियों की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है। अनशन का आज 23वां दिन है। संघर्षशील साथी प्रीति धीमान (33 वर्ष) की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है, जिनके अनशन का आज आठवां दिन है।

​आंदोलन की विडंबना देखिए कि अब तक 12 से अधिक  साथी—जिनमें सरिता जोशी, स्तुति सती, शिरा बधानी, प्रियंका उनियाल और राजेश शर्मा जैसे नाम शामिल हैं—अत्यधिक कमजोरी और स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण ICU में भर्ती किए जा चुके हैं। लेकिन, अस्पताल के बिस्तर पर लेटे होने के बावजूद इन युवाओं की आँखों में अपने अधिकारों के प्रति चमक कम नहीं हुई है।

क्या हैं वो मांगें, जिनके लिए दांव पर लगी है जान?

​नर्सिंग एकता मंच की लड़ाई मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर टिकी है, जिन्हें वे अपनी गरिमा और भविष्य का आधार मानते हैं:​वर्षवार भर्ती का स्थायी समाधान: अभ्यर्थियों की पहली मांग है कि नर्सिंग नियमावली को स्थायी रूप से वर्षवार (Year-wise) लागू किया जाए। उनका तर्क है कि इससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और वरिष्ठता का सम्मान होगा।​2000 रिक्त पदों पर तत्काल बहाली: IPHS (Indian Public Health Standards) के मानकों के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग में रिक्त पड़े 2000 पदों पर पुरानी चयन प्रक्रिया (वर्षवार) के आधार पर तत्काल भर्ती शुरू की जाए।​पुराने अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा: वर्ष 2020 में लागू की गई नई परीक्षा प्रणाली से पहले के जो अभ्यर्थी हैं, उनके भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें पुरानी नियमावली के तहत ही अवसर प्रदान किया जाए।

  बढ़ता आक्रोश

​राजधानी के परेड ग्राउंड के पास प्रदर्शनकारियों के टंकी पर चढ़ने की खबर मिलते ही पुलिस और जिला प्रशासन के आला अधिकारी मौके पर पहुँचे। अधिकारियों द्वारा लाउडस्पीकर से प्रदर्शनकारियों को नीचे उतरने की अपील की जा रही है, लेकिन बेरोजगारों का आक्रोश सातवें आसमान पर है।प्रदर्शनकारियों का कहना है कि, “हमने अपनी जवानी के कई साल पढ़ाई और फिर सड़कों पर खाक छानने में बिता दिए। अगर सरकार हमें रोजगार नहीं दे सकती, तो हमारे पास अपनी जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।”

नर्सिंग समुदाय का एकजुट आह्वान

​नर्सिंग एकता मंच ने स्पष्ट कर दिया है कि यह लड़ाई अब केवल कुछ सौ लोगों की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पूरे नर्सिंग समुदाय के सम्मान की लड़ाई बन चुकी है। 158 दिनों का लंबा समय किसी भी सरकार की संवेदनशीलता को परखने के लिए काफी होता है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और शासन के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा ये शिक्षित युवा भुगत रहे हैं।

देहरादून की सड़कों से लेकर पानी की टंकी तक फैला यह आक्रोश यह बताने के लिए काफी है कि देवभूमि का युवा अब थक चुका है। यदि समय रहते इन नर्सिंग प्रशिक्षितों की मांगों पर सकारात्मक विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन को और तेज कर सकते हैं अब देखना यह है कि  स्वास्थ्य विभाग इस   मुद्दे पर कब और क्या निर्णय लेते हैं।

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