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देहरादून: राजधानी के सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज इंजेक्शन का टोटा, मरीजों की बढ़ी मुश्किलें; सीएमएस बोले- “मरीज खुद खरीदें अगली डोज”

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देहरादून: राजधानी के सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज इंजेक्शन का टोटा, मरीजों की बढ़ी मुश्किलें; सीएमएस बोले- “मरीज खुद खरीदें अगली डोज”

​ ब्यूरो रिपोर्ट | देहरादून दिनांक: 27 मार्च, 2026

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सरकारी अस्पतालों में इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खुलती नजर आ रही है। जिले के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में ‘एंटी-रेबीज’ इंजेक्शन (ARV) खत्म होने की वजह से आवारा कुत्तों और जानवरों के काटने का शिकार हुए मरीज दर-दर भटकने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि स्मार्ट सिटी के सबसे व्यस्त अस्पतालों में शुमार जिला अस्पतालों के पास मरीजों को पूरी डोज लगाने तक का स्टॉक उपलब्ध नहीं है।

मरीजों की व्यथा: पर्चा हाथ में, अस्पताल में ‘नो स्टॉक’

​राजधानी के अस्पतालों में हर रोज दर्जनों की संख्या में कुत्ते के काटने के मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन इंजेक्शन न होने के कारण मरीजों को निजी क्लीनिकों या ऊंचे दामों पर मेडिकल स्टोरों का रुख करना पड़ रहा है। अस्पताल पहुंच रहे मरीजों का कहना है कि वे कई दिनों से चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें ‘स्टॉक खत्म’ होने की बात कहकर लौटा दिया जाता है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ रेबीज जैसे जानलेवा खतरे के लिए जरूरी जीवन रक्षक इंजेक्शन की कमी ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोरोनेशन अस्पताल का हाल: उधार मांगकर चल रहा काम

​इस गंभीर संकट पर कोरोनेशन अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (CMS) डॉक्टर मनु जैन ने स्वीकार किया है कि अस्पताल में इंजेक्शन की भारी कमी चल रही है। उन्होंने बताया कि व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए दूसरे अस्पतालों से अनुरोध कर महज 55 इंजेक्शन मंगाए गए हैं, जो कि मरीजों की संख्या देखते हुए ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है।

​डॉ. मनु जैन ने कहा, “इंजेक्शन की कमी को लेकर उच्चाधिकारियों को पत्राचार किया जा रहा है। वर्तमान में स्थिति यह है कि हम केवल पहली डोज ही अस्पताल से लगा पा रहे हैं। मरीजों को स्पष्ट रूप से कहा जा रहा है कि वे दूसरी और तीसरी डोज का इंतजाम खुद बाहर से करें, क्योंकि हमारे पास पर्याप्त स्टॉक नहीं है।”

स्वास्थ्य विभाग पर उठते सवाल

​अस्पताल प्रशासन की इस स्वीकारोक्ति ने मरीजों की चिंता और बढ़ा दी है। रेबीज एक ऐसा संक्रमण है जिसमें समय पर पूरी डोज न मिलने पर मरीज की जान भी जा सकती है। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि आखिर निदेशालय और स्वास्थ्य विभाग ने समय रहते इंजेक्शन का बफर स्टॉक क्यों सुनिश्चित नहीं किया? क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?

​राजधानी के अस्पतालों की यह हालत है, तो दूरदराज के पहाड़ी इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। फिलहाल, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के दावों के बीच गरीब मरीज प्राइवेट स्टोरों पर भारी भरकम खर्च करने को विवश है।

डॉ. मनु जैन (CMS, कोरोनेशन हॉस्पिटल) “स्टॉक खत्म होने के कारण दिक्कतें आ रही हैं। हमने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत 55 इंजेक्शन अन्य केंद्रों से मंगाए हैं। डिमांड भेजी जा चुकी है। फिलहाल हम प्रायोरिटी के आधार पर पहली डोज दे रहे हैं, शेष डोज के लिए मरीजों को सूचित किया जा रहा है।”

​ “साहब, तीन दिन से चक्कर काट रहे हैं। डॉक्टर कहते हैं बाहर से खरीद लो। गरीब आदमी 400-500 रुपये का इंजेक्शन बाहर से कैसे खरीदेगा?” “अस्पताल में सिर्फ पर्चा बन रहा है, इलाज के नाम पर कुछ नहीं है। अगर कुत्ते के काटने पर भी इंजेक्शन नहीं मिलेगा, तो सरकारी अस्पताल आने का फायदा क्या?”

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