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हिमालय के 170 साल पुराने वैभव से रूबरू हुआ देहरादून: दून पुस्तकालय में श्लागिंटवाईट बंधुओं की चित्र प्रदर्शनी का शानदार आगाज

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हिमालय के 170 साल पुराने वैभव से रूबरू हुआ देहरादून: दून पुस्तकालय में श्लागिंटवाईट बंधुओं की चित्र प्रदर्शनी का शानदार आगाज

देहरादून,2026। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित ‘दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र’ में आज एक ऐतिहासिक शाम का गवाह बना। अवसर था जर्मनी के प्रसिद्ध श्लागिंटवाईट (Schlagintweit) बंधुओं द्वारा लगभग पौने दो सौ साल पहले निर्मित हिमालयी चित्रों की प्रदर्शनी का भव्य शुभारंभ। यह प्रदर्शनी न केवल कला प्रेमियों के लिए, बल्कि इतिहासकारों, भूगोलवेत्ताओं और शोधकर्ताओं के लिए भी तत्कालीन हिमालय को समझने का एक दुर्लभ झरोखा साबित हो रही है।

जर्मनी के संग्रहालय से दून तक का सफर

​पहाड़ संस्था के संस्थापक और प्रख्यात इतिहासकार प्रो. शेखर पाठक की विशेष पहल पर ये चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकलकर आम जनमानस के बीच पहुँचे हैं। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि में म्यूनिख संग्रहालय, श्लागिंटवाईट परिवार के सदस्यों, प्रो. हरमन क्रुत्जमैन, मैडम स्टेफनी क्लेइट और स्टीफन रिट्टर का तकनीकी व अकादमिक सहयोग रहा है। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर से शुरू हुई यह प्रदर्शनी देहरादून के बाद अब नैनीताल के सीआरएसटी कॉलेज में भी प्रदर्शित की जाएगी।

इतिहास का सजीव साक्षात्कार

​प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण जम्मू-कश्मीर से लेकर दार्जिलिंग तक फैला हिमालयी क्षेत्र है। चित्रों के माध्यम से दर्शक तत्कालीन बदरीनाथ, केदारनाथ, मिलम, सुन्दरढूंगा और नैनीताल जैसे स्थानों के उस स्वरूप को देख पा रहे हैं, जो आज के आधुनिक विकास से कोसों दूर और प्राकृतिक रूप से अछूता था। तीन जर्मन भाइयों की इस साहसिक यात्रा के दौरान तैयार किए गए ये चित्र नदियों, दुर्गम पर्वतों, प्राचीन पुलों, रास्तों और मंदिरों के तत्कालीन इतिहास की जीवंत झलकियां प्रस्तुत करते हैं।

विशेषज्ञों के विचार: 2015 में पड़ा था बीज

​कार्यक्रम के दौरान प्रो. शेखर पाठक ने बताया कि इस प्रदर्शनी का विचार सितंबर 2015 में म्यूनिख में आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान आया था। उन्होंने कहा कि श्लागिंटवाईट बंधुओं ने केवल चित्र ही नहीं बनाए, बल्कि उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों के मानचित्र, नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तुएं और विस्तृत अभिलेख भी संकलित किए थे। ये चित्र बाद में परिवार द्वारा म्यूनिख के अल्पाइन संग्रहालय को दान कर दिए गए थे।

​वहीं, प्रो. हरमन क्रुत्जमैन ने इन चित्रों के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। दून पुस्तकालय के संस्थापक प्रो. बी.के. जोशी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी समाज विज्ञानियों और शोधार्थियों के लिए ज्ञान का खजाना है। पूर्व मुख्य सचिव एन. रविशंकर ने इस बौद्धिक विमर्श की निरंतरता की सराहना करते हुए इसे ज्ञानवर्धक बताया।

सांस्कृतिक छटा और गरिमामयी उपस्थिति

​प्रदर्शनी का उद्घाटन लोक कलाकार रामचरण जुयाल के ‘मोंछंग’ (एक पारंपरिक वाद्य यंत्र) की मधुर धुनों के साथ हुआ, जिसने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. लोकेश ओहरी ने किया, जबकि केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने चित्रों के संदर्भ में संक्षिप्त जानकारी साझा की।

​इस अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व सचिव नृप सिंह नपलच्याल, सुरेंद्र सिंह पांगती, सर्वे ऑफ इंडिया के एडिशनल सर्वेयर संदीप श्रीवास्तव, डॉ. पंकज नैथानी, डॉ. डी.के. पाण्डे सहित भारी संख्या में साहित्यकार, इतिहासकार, चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

दर्शकों के लिए सूचना

​हिमालय से साक्षात्कार कराती यह विशेष प्रदर्शनी आम जनता के लिए 1 मई से 8 मई 2026 तक निशुल्क खुली रहेगी।​स्थान: दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, तृतीय तल।​समय: प्रातः 11:00 बजे से सायं 6:30 बजे तक।

​यह प्रदर्शनी न केवल हमें हमारे गौरवशाली अतीत की याद दिलाती है, बल्कि पर्यावरण और हिमालयी भूगोल में आए बदलावों पर आत्मचिंतन करने का अवसर भी प्रदान करती है।

रिपोर्ट: सोहन सिंह

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