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पौड़ी गढ़वाल: दिगोली गाँव में गहराया पेयजल संकट, बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण; विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश

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पौड़ी गढ़वाल: दिगोली गाँव में गहराया पेयजल संकट, बूंद-बूंद पानी को तरसे ग्रामीण; विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश

  • गर्मी की दस्तक के साथ ही ऊंचाई वाले इलाकों में हाहाकार; कई दिनों से खाली पड़ी हैं पेयजल टंकियां
  • भोजन बनाने से लेकर मवेशियों के लिए पानी का संकट; स्कूली बच्चों की पढ़ाई भी हो रही प्रभावित
  • अधिकारियों की बेरुखी से भड़के ग्रामीण, बोले— ‘शिकायतों के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है जल संस्थान’

पौड़ी (उत्तराखंड)। पर्वतीय क्षेत्रों में तपिश बढ़ने के साथ ही पेयजल किल्लत का पुराना और दर्दनाक सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया है। जनपद पौड़ी के पर्वतीय और ऊंचाई वाले इलाकों में पानी की समस्या दिनों-दिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। इसका सबसे ताजा और गंभीर रूप पौड़ी के दिगोली गाँव में देखने को मिल रहा है, जहाँ पानी की जटिल समस्या के कारण स्थानीय ग्रामीणों का जीना मुहाल हो गया है। विभाग की इस घोर लापरवाही और सुस्त कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

​ग्रामीणों का साफ कहना है कि हर साल गर्मी शुरू होते ही जल संस्थान और पेयजल निगम के अधिकारी व कर्मचारी पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। उनकी इस लापरवाही का खामियाजा आज दिगोली गाँव की पूरी आबादी को भुगतना पड़ रहा है।

टंकियां सूखी, दिनचर्या पूरी तरह ठप

​दिगोली गाँव के ऊंचाई वाले हिस्से में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पिछले कई दिनों से मुख्य पेयजल टंकियां पूरी तरह खाली पड़ी हैं, लेकिन विभाग की ओर से पानी की सप्लाई को सुचारू करने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। पानी न आने की वजह से ग्रामीणों के सामने दैनिक जीवन का संकट खड़ा हो गया है।​ग्रामीणों की व्यथा: > “सुबह उठने के साथ ही पानी की चिंता शुरू हो जाती है। घर में भोजन बनाने, नहाने-धोने से लेकर दैनिक जीवन की तमाम जरूरतें पानी के बिना ठप पड़ी हैं। हमें मीलों दूर जाकर प्राकृतिक स्रोतों (गधेरों) से पानी ढोकर लाना पड़ रहा है, जिससे पूरा दिन सिर्फ पानी के इंतजाम में ही बीत जाता है।”

 

स्कूली छात्राओं और मवेशियों पर दोहरी मार

​इस पेयजल संकट का सबसे बुरा असर गाँव के स्कूली बच्चों, खासकर छात्राओं पर पड़ रहा है। सुबह-सुबह पानी की व्यवस्था में हाथ बंटाने के कारण कई छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, वहीं स्कूलों में भी पानी की समुचित व्यवस्था न होने से उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

​इसके साथ ही, पर्वतीय जीवन का मुख्य आधार माने जाने वाले मवेशियों (पशुओं) के लिए भी यह समय किसी आपदा से कम नहीं है। पानी की भारी किल्लत के कारण ग्रामीण अपने मवेशियों को पर्याप्त पानी नहीं पिला पा रहे हैं, जिससे तपती गर्मी में बेजुबान पशु भी प्यास से तड़पने को मजबूर हैं। गाँव के किसानों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो पशुपालन ठप हो जाएगा।

अधिकारियों की बेरुखी: न नल में पानी, न टैंकर की सप्लाई

​ग्रामीणों का आरोप है कि इस विकराल समस्या को लेकर उन्होंने कई बार जल संस्थान और पेयजल निगम के चक्कर काटे, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। बार-बार लिखित और मौखिक शिकायत दर्ज कराने के बावजूद न तो कोई अधिकारी मौके पर आया और न ही समस्या के समाधान के लिए कोई उचित कदम उठाया गया।

​ग्रामीणों ने इस बात पर भी गहरा रोष जताया कि यदि लाइनों में तकनीकी खराबी के कारण पानी नहीं आ रहा था, तो विभाग को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर गाँव में पानी के टैंकर भेजने चाहिए थे। लेकिन दिगोली गाँव में न तो सरकारी टैंकरों की सप्लाई की जा रही है और न ही मुख्य लाइन को ठीक किया जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर दिख रही यह उदासीनता स्थानीय जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।

बड़ा सवाल: आखिर कब टूटेगी कुंभकर्णी नींद?

​अब ऐसे में सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि जल संस्थान और पेयजल निगम के उच्चाधिकारियों की नींद आखिर कब खुलेगी? गर्मी के शुरुआती दौर में ही जब दिगोली गाँव की यह स्थिति है, तो आने वाले दिनों में संकट कितना बड़ा रूप अख्तियार करेगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

​स्थानीय जनता ने शासन-प्रशासन और जिला प्रशासन पौड़ी से मांग की है कि दिगोली गाँव की इस जटिल समस्या का संज्ञान लेते हुए तत्काल प्रभाव से सुचारू पेयजल आपूर्ति बहाल की जाए और लापरवाह कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पानी की किल्लत दूर नहीं हुई, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन और विभागीय कार्यालयों का घेराव करने को बाध्य होंगे।

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