आवास पात्रता सूची जारी होते ही भड़का ग्राम प्रधानों का आक्रोश; धांधली का आरोप लगा दोबारा जांच की मांग
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आवास पात्रता सूची जारी होते ही भड़का ग्राम प्रधानों का आक्रोश; धांधली का आरोप लगा दोबारा जांच की मांग
अकील अहमद कासिमाबाद (गाजीपुर), 20 जून 2026।
केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री आवास योजना के अंतर्गत हाल ही में जारी की गई नई पात्रता सूची को लेकर गाजीपुर जिले के कासिमाबाद विकास खंड में सियासी घमासान शुरू हो गया है। सूची सार्वजनिक होते ही क्षेत्र के ग्राम प्रधानों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में भारी असंतोष और आक्रोश देखने को मिल रहा है। अपात्रों को लाभ मिलने और वास्तविक जरूरतमंदों के नाम सूची से काटे जाने का आरोप लगाते हुए ग्राम प्रधानों ने चयन प्रक्रिया की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस संबंध में प्रधान संघ ने जिला प्रशासन से पूरी सूची की निष्पक्ष और दोबारा जांच (री-वेरिफिकेशन) कराने की पुरजोर मांग की है।
जमीनी हकीकत से खिलवाड़ का आरोप
ग्रामीण विकास की धुरी माने जाने वाले ग्राम प्रधानों का साफ कहना है कि वे अपने गांवों की सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक स्थिति से पल-पल वाकिफ हैं। किस परिवार को सिर छिपाने के लिए छत की दरकार है, इसे स्थानीय जनप्रतिनिधियों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। ऐसे में आवास जैसे संवेदनशील और जीवन बदलने वाले मिशन की चयन प्रक्रिया में ग्राम प्रधानों की राय को पूरी तरह दरकिनार करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
प्रधानों का आरोप है कि पूर्व में हुए सर्वे के दौरान जिन अत्यंत गरीब और बेघर परिवारों को इस कल्याणकारी योजना के लिए पूरी तरह पात्र माना गया था, उनमें से एक बड़ी संख्या को अंतिम डिजिटल सूची से रहस्यमय तरीके से गायब कर दिया गया है। डिजिटल मैपिंग और विभागीय पेचीदगियों के चलते वास्तविक रूप से झोपड़ियों में रहने वाले गरीब इस बार भी पक्के मकान के अधिकार से वंचित रह गए हैं।
’केवल 20 से 25 प्रतिशत नाम ही सूची में आए सामने’
कासिमाबाद क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जमीनी स्तर पर हुए सर्वे के आधार पर जो प्रारंभिक डेटा तैयार किया गया था, उसमें पात्र परिवारों की संख्या काफी अधिक थी। नियमों के मुताबिक हर गरीब इस दायरे में आ रहा था, लेकिन जब अंतिम आधिकारिक सूची पोर्टल पर लाइव हुई, तो उसमें से करीब 75 से 80 फीसदी नाम गायब मिले। जारी की गई वर्तमान सूची में महज 20 से 25 प्रतिशत पात्रों के ही नाम शामिल किए गए हैं।
इस कटौती के बाद से ग्रामीण इलाकों में आक्रोश की चिंगारी सुलग उठी है। गांवों में चौपालों से लेकर ब्लॉक मुख्यालय तक इस विषय को लेकर तीखी चर्चाएं और विरोध प्रदर्शनों का दौर तेज हो गया है। ग्रामीणों का दबाव अब सीधे तौर पर ग्राम प्रधानों पर आ रहा है, जिसके चलते जनप्रतिनिधि आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रहे हैं।
जिलाधिकारी को सौंपा पत्र, आंदोलन की चेतावनी
मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्राम प्रधान संघ कासिमाबाद के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी (डीएम) को संबोधित एक विस्तृत मांग पत्र प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा। इस पत्र के माध्यम से मांग की गई है कि तकनीकी और विभागीय स्तर पर तैयार सूची के बजाय गांवों से फिजिकल सर्वे के माध्यम से भेजी गई मूल सूची को प्राथमिकता दी जाए। साथ ही, तकनीकी खामियों या विभागीय लापरवाही के कारण छूटे हुए सभी वास्तविक जरूरतमंद परिवारों को अविलंब पूरक सूची (Supplementary List) जारी कर शामिल किया जाए।
संघ के पदाधिकारियों का तर्क है कि यदि इस पूरी सूची की ब्लॉकवार और ग्राम पंचायतवार निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इससे भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी और सरकार की इस जनकल्याणकारी योजना का मूल उद्देश्य भी पूरा हो सकेगा।
भारी संख्या में जुटे जनप्रतिनिधि
इस विरोध प्रदर्शन और मांग पत्र सौंपने के दौरान क्षेत्र के सियासी और सामाजिक समीकरणों से जुड़े कई दिग्गज चेहरे एक मंच पर नजर आए। मुख्य रूप से ब्लॉक प्रमुख मनोज गुप्ता, पूर्व ब्लॉक प्रमुख श्याम नारायण राम, ग्राम प्रधान संघ के क्षेत्रीय अध्यक्ष रंजीत सिंह और वरिष्ठ नेता सुरेन्द्र यादव सहित क्षेत्र के दर्जनों गांवों के ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्य और भारी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
सभी नेताओं ने एक सुर में कहा कि यदि प्रशासन ने जल्द ही इस विसंगति को दूर नहीं किया और पात्रता सूची की दोबारा जांच शुरू नहीं कराई, तो वे लखनऊ से लेकर दिल्ली तक अपनी आवाज बुलंद करेंगे। बहरहाल, इस पूरे विवाद के बाद अब गाजीपुर जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। देखना होगा कि क्या सरकार के रडार पर बैठे वास्तविक गरीबों को उनके हक का आशियाना मिल पाता है या वे फाइलों के इस खेल में उलझकर रह जाते हैं।
