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बहादुरगंज (गाजीपुर) में अकीदत व गम के साथ संपन्न हुआ सातवीं मोहर्रम का जुलूस, कर्बला से लाई गई मिट्टी

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बहादुरगंज (गाजीपुर) में अकीदत व गम के साथ संपन्न हुआ सातवीं मोहर्रम का जुलूस, कर्बला से लाई गई मिट्टी

बहादुरगंज (गाजीपुर)।

कस्बा बहादुरगंज में मोहर्रम की सातवीं तारीख को अकीदत, गम और गहरी धार्मिक श्रद्धा के साथ पारंपरिक जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक और पारंपरिक अवसर पर विभिन्न अंजुमनों द्वारा निर्धारित मार्गों से मातमी जुलूस निकाला गया। अकीदतमंदों ने कर्बला पहुंचकर मिट्टी उठाने की रस्म अदा की और उसे वापस लेकर आए। इस पूरे आयोजन के दौरान वातावरण “या हुसैन” और “या अब्बास” के गगनभेदी नारों से गूंजता रहा।

​निर्धारित मार्गों से गुजरा जुलूस

​सुबह से ही कस्बे के विभिन्न मोहल्लों में मोहर्रम को लेकर धार्मिक गतिविधियां शुरू हो गई थीं। विभिन्न अंजुमनों के सदस्य पारंपरिक पोशाकों में सजकर अपने-अपने इमामबाड़ों और अज़ाखानों से बाहर निकले। यह पारंपरिक जुलूस पुरानीगंज, छावनी, पठान टोली, दक्खिन मोहल्ला, सदर बाजार, हनुमान मंदिर और बरवातर जैसे प्रमुख क्षेत्रों से होते हुए चांदनी चौक के आगे स्थित कर्बला पहुंचा। जुलूस में बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों समेत भारी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की और कर्बला के शहीदों को अपनी खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की।

​मातमी दस्तों ने किया सीना-जनी, जीवंत हुई कर्बला की याद

​जुलूस में शामिल मातमी दस्तों ने नौहाख्वानी और सीना-जनी कर हजरत इमाम हुसैन और उनके ७२ जांबाज साथियों की शहादत को याद किया। कर्बला के मैदान में सत्य और न्याय के लिए दिए गए बलिदान को याद कर माहौल अत्यंत गमगीन हो गया। अंजुमनों के जिम्मेदारों ने बताया कि सातवीं मोहर्रम का यह जुलूस इस क्षेत्र की वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जिसे हर साल पूरी शिद्दत, अकीदत और कड़े अनुशासन के साथ मनाया जाता है।

​कर्बला से मिट्टी लाने की रस्म और मजलिस का आयोजन

​कर्बला मैदान पहुंचकर ताजियादारों और अंजुमनों ने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार मिट्टी उठाई और उसे बेहद अदब व सम्मान के साथ वापस लेकर आए। इसके बाद सभी अंजुमनों ने अपने-अपने इमामबाड़ों में मजलिस का आयोजन किया। मजलिस को संबोधित करते हुए उलेमा और जाकिरों ने कर्बला के ऐतिहासिक संदर्भ और इमाम हुसैन के संदेशों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि:

​”इमाम हुसैन ने सत्य, न्याय, मानवता और सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार की कुर्बानी दे दी। उनका यह सर्वोच्च बलिदान किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”

 

​सुरक्षा व्यवस्था और आपसी सौहार्द की मिसाल

​जुलूस को सुरक्षित और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल बेहद मुस्तैद नजर आया। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर चौकी प्रभारी बहादुरगंज पुष्पेशचंद दुबे अपने हमराहियों के साथ पूरे मार्ग पर मुस्तैद रहे और लगातार गश्त कर स्थिति का जायजा लेते रहे। इसके अलावा, जगह-जगह स्वयंसेवकों को तैनात किया गया था, जिन्होंने यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने और श्रद्धालुओं की मदद करने में प्रशासन का सहयोग किया।

​कस्बे के नागरिकों ने भी इस मौके पर गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल पेश की। जुलूस के रास्ते में जगह-जगह पर आम लोगों द्वारा अकीदतमंदों के लिए पीने के पानी, शर्बत और अन्य जरूरी सुविधाओं के स्टॉल लगाए गए थे।

​प्रमुख लोगों की रही मौजूदगी

​इस ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय ताजियादारों और संभ्रांत नागरिकों की मुख्य भूमिका रही। कार्यक्रम में मुख्य रूप से मुस्तफा खान, चुन्नू शेख, नौशाद खान, नौशाद अयान, रियाजुद्दीन, मोहम्मद सद्दाम, शाहनवाज शाह, मोहम्मद जाहिद, मोहम्मद इस्माइल, रईस अहमद, सोनू समेत क्षेत्र के सैकड़ों गणमान्य लोग और भारी संख्या में जनसमुदाय उपस्थित रहा। शाम तक सभी कार्यक्रम शांति और भाईचारे के माहौल में संपन्न हो गए।

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