उत्तराखंड शिक्षा विभाग में स्थानांतरण का ‘पेच’: सुगम-दुर्गम के बीच फंसी अनिवार्य तबादला नीति
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उत्तराखंड शिक्षा विभाग में स्थानांतरण का ‘पेच’: सुगम-दुर्गम के बीच फंसी अनिवार्य तबादला नीति
विशेष रिपोर्ट: प्रदीप भंडारी (पूर्व जिला अध्यक्ष, रा. शिक्षक संघ चमोली) के पत्र का विश्लेषण
देहरादून/चमोली:
उत्तराखंड के राजकीय माध्यमिक शिक्षा विभाग में इस वर्ष भी अनिवार्य स्थानांतरणों पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। चमोली जिले के पूर्व जिला अध्यक्ष प्रदीप भंडारी द्वारा प्रांतीय कार्यकारिणी को लिखे गए पत्र ने शिक्षा विभाग के भीतर चल रहे ‘ट्रांसफर पॉलिटिक्स’ और विसंगतियों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यह मुद्दा केवल शिक्षकों के तबादले का नहीं, बल्कि राज्य की दुर्गम शिक्षा व्यवस्था और नीतिगत निर्णयों के ‘टर्निंग पॉइंट’ का है।
मुख्य सचिव की कमेटी और हाईकोर्ट की रोक का तर्क
हाल ही में 24 मार्च 2026 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय कमेटी की संस्तुति से यह स्पष्ट हुआ है कि इस वर्ष भी केवल अनुरोध (Request), पारस्परिक (Mutual) और गंभीर बीमारी के आधार पर ही स्थानांतरण किए जाएंगे। शासन का तर्क है कि हाईकोर्ट की रोक के कारण वार्षिक ‘अनिवार्य स्थानांतरण’ संभव नहीं है।
लेकिन, शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग इस तर्क से सहमत नहीं है। प्रदीप भंडारी का तर्क है कि हाईकोर्ट ने जिस आधार पर रोक लगाई है, वह सीधे तौर पर माध्यमिक विद्यालयों से जुड़ा प्रकरण नहीं है। शासन को चाहिए कि वह इस कानूनी पेच को सुलझाकर दुर्गम में वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को न्याय दिलाए।
‘पारस्परिक स्थानांतरण’ का खेल और रिक्तियों का संकट
पत्र में एक गंभीर आरोप लगाया गया है जिसे “पारस्परिक स्थानांतरण का खेल” कहा जा सकता है।
- मैदानी मोह का जाल: राजधानी और उसके आसपास के जनपदों में जमे हुए शिक्षक अपने नजदीकी दुर्गम विद्यालयों के साथियों के साथ ‘म्युचुअल ट्रांसफर’ कर लेते हैं। इससे पद कभी रिक्त ही नहीं होते।
- दुर्गम के शिक्षकों की अनदेखी: जब तक सुगम और मैदानी क्षेत्रों के शिक्षक ‘अनिवार्य’ रूप से नहीं हटाए जाएंगे, तब तक दुर्गम जनपदों (जैसे चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़) के शिक्षकों के लिए सुगम क्षेत्रों में सीटें खाली ही नहीं होंगी।
- सेवा गुणांक का औचित्य: दुर्गम जिलों का अध्यापक वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में सेवा देकर जो ‘सेवा गुणांक’ अर्जित करता है, यदि उसे सुगम में आने का अवसर ही न मिले, तो उस गुणांक का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव
यदि अनिवार्य स्थानांतरण नहीं होते हैं, तो इसका सीधा असर शिक्षकों के मनोबल पर पड़ता है। चमोली जैसे जनपदों में तैनात शिक्षक वर्षों से इस उम्मीद में हैं कि एक दिन उनकी सेवा का फल उन्हें सुगम तैनाती के रूप में मिलेगा। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि यदि वर्षों से मैदानी जिलों में जमे हुए साथियों का अनिवार्य स्थानांतरण नहीं होगा, तो अनुरोध के लिए ऐच्छिक स्थान (Options) कहाँ से मिलेंगे?
प्रांतीय कार्यकारिणी से अपेक्षाएं
राजकीय शिक्षक संघ उत्तराखंड की प्रांतीय कार्यकारिणी से अनुरोध किया गया है कि वे शासन स्तर पर मजबूती से पैरवी करें। मांग यह है कि:
- हाईकोर्ट के प्रकरण का त्वरित निस्तारण कराया जाए।
- अनुरोध के साथ-साथ अनिवार्य स्थानांतरण को भी इसी सत्र (2026-27) में लागू किया जाए।
- ’पारस्परिक स्थानांतरण’ की आड़ में चल रहे चहेतों को लाभ पहुँचाने के खेल को बंद किया जाए।
प्रशासनिक दृढ़ता की आवश्यकता
उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य में स्थानांतरण नीति केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का हिस्सा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और शिक्षा मंत्री को इस पत्र में उठाए गए बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्या सरकार इस कानूनी बाधा को पार कर पाएगी? क्या दुर्गम के शिक्षकों को इस वर्ष उनका हक मिलेगा? यह आने वाले समय का सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है।
