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चिपको आंदोलन की जननी: क्या रैणी गांव की ‘गौरा देवी’ को मिलेगा मरणोपरांत भारत रत्न?

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चिपको आंदोलन की जननी: क्या रैणी गांव की ‘गौरा देवी’ को मिलेगा मरणोपरांत भारत रत्न?

​सोहन सिंह देहरादून/चमोली: उत्तराखंड के चमोली जनपद स्थित रैणी गांव, जो कभी विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन की जन्मस्थली बना था, आज एक बार फिर चर्चा में है। पर्यावरण संरक्षण की मिसाल पेश करने वाली इस पावन भूमि से अब एक स्वर बुलंद हो रहा है— ‘चिपको वुमन’ गौरा देवी को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग।

ऐतिहासिक फ्लैशबैक: जब महिलाओं ने बचाए थे 2500 पेड़

​सत्तर के दशक में, जब देश में वन संरक्षण के कानून बेहद लचीले थे, तब रैणी गांव के जंगलों पर कुल्हाड़ियों का साया मंडरा रहा था। 26 मार्च 1974 का वह ऐतिहासिक दिन आज भी ग्रामीणों की यादों में ताजा है। ठेकेदारों के मजदूर करीब 2500 पेड़ों को काटने के इरादे से गांव पहुंचे थे। उस वक्त गांव के पुरुष मुआवजे के सिलसिले में बाहर गए हुए थे, लेकिन ठेकेदारों ने शायद महिलाओं की शक्ति का अंदाजा नहीं लगाया था।

गौरा देवी का साहस: “पहले हमें काटो, फिर पेड़”

​जब मजदूरों ने पेड़ों पर वार करना शुरू किया, तब गौरा देवी के नेतृत्व में 27 महिलाओं ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। उन्होंने किसी हथियार का नहीं, बल्कि ‘अहिंसक आलिंगन’ का रास्ता चुना। महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं और स्पष्ट संदेश दिया— “पहले हमें काटो, फिर पेड़”। इस अडिग संकल्प ने न केवल ठेकेदारों को पीछे हटने पर मजबूर किया, बल्कि भविष्य के लिए वन संरक्षण की एक नई इबारत लिख दी।

“जंगल हमारे मायके की तरह हैं, इन्हें बचाने के लिए हम अपनी जान भी दे सकती हैं।” > — गौरा देवी (चिपको आंदोलन के दौरान)

 

स्थानीय महिलाओं का संकल्प और अधूरी मांगें

​आज भी ऊखा देवी, जूठी देवी, तुलसी देवी और उमा देवी जैसी महिलाएं इस विरासत को संभाल रही हैं। उनका कहना है कि जंगल उनकी आजीविका और आने वाली पीढ़ियों की सांसों का आधार हैं। हालांकि, गांव की कुछ शिकायतें भी हैं:

  • अधूरा स्मारक: बजट के अभाव में गौरा देवी का स्मारक आज भी अधूरा पड़ा है।
  • सम्मान की मांग: गौरा देवी पर्यावरण एवं सामाजिक विकास समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा और संरक्षक पुष्कर सिंह राणा ने सरकार से उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की अपील की है।

वैश्विक स्तर पर अमिट छाप

​चिपको आंदोलन ने न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को एक नई दिशा दी। आज जब दुनिया ‘क्लाइमेट चेंज’ जैसी आपदाओं से जूझ रही है, तब रैणी गांव का यह मॉडल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोध का विषय बना हुआ है।

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