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UP News: समाज कल्याण विभाग में बड़ा Action 100 प्रवक्ताओं के अवैध प्रमोशन रद्द, सीएम योगी हुए सख्त,

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UP News: समाज कल्याण विभाग में बड़ा Action 100 प्रवक्ताओं के अवैध प्रमोशन रद्द, सीएम योगी हुए सख्त,

लखनऊ | उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण विभाग में नियमों को ताक पर रखकर पदोन्नति (Promotion) बांटने के एक बड़े खेल का पर्दाफाश हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय (CMO) तक मामला पहुंचने के बाद सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालयों (नवोदय की तर्ज पर संचालित सर्वोदय स्कूलों) में कार्यरत 100 प्रवक्ताओं के प्रधानाचार्य पद पर हुए प्रमोशन को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

​इस बड़ी कार्रवाई के बाद विभाग के भीतर हड़कंप मचा हुआ है और उन रसूखदार अधिकारियों की ‘कुंडली’ खंगाली जा रही है, जिन्होंने नियमों को दरकिनार कर इस मिलीभगत को अंजाम दिया।

क्या है पूरा मामला?

​समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित सर्वोदय विद्यालयों में खाली पड़े प्रधानाचार्य के पदों को भरने के लिए हाल ही में विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक हुई थी। इस प्रक्रिया के तहत लगभग 100 प्रवक्ताओं को प्रधानाचार्य के पद पर प्रोन्नत किया गया था। हालांकि, जैसे ही पदोन्नति की सूची सार्वजनिक हुई, विभाग के भीतर ही विरोध के स्वर उठने लगे।

​आरोप लगा कि पदोन्नति की प्रक्रिया में वरिष्ठता सूची (Seniority List) की अनदेखी की गई और कई ऐसे अपात्र प्रवक्ताओं को पदोन्नत कर दिया गया, जो निर्धारित योग्यता या अनुभव की शर्तों को पूरा नहीं करते थे।

मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से पलटा फैसला

​सूत्रों के अनुसार, इस गड़बड़ी की शिकायत साक्ष्यों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय तक पहुंची थी। जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रही सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच में पाया गया कि पदोन्नति प्रक्रिया में गंभीर प्रशासनिक चूक हुई है और विभागीय अधिकारियों ने नियमों का खुला उल्लंघन किया है।

​मुख्यमंत्री के संज्ञान लेने के बाद शासन ने इन सभी 100 प्रवक्ताओं के प्रमोशन को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। अब ये सभी कार्मिक पुनः अपने मूल पद (प्रवक्ता) पर वापस भेज दिए गए हैं।

प्रशासनिक चूक या सोची-समझी मिलीभगत?

​इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज एक मानवीय भूल थी या फिर इसके पीछे किसी तरह का बड़ा भ्रष्टाचार या मिलीभगत छिपी है। जांच के दायरे में वे अधिकारी हैं जो चयन समिति का हिस्सा थे।​नियमों का उल्लंघन: प्रमोशन के लिए आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि और अर्हता की जांच क्यों नहीं की गई?वरिष्ठता की अनदेखी: योग्य और वरिष्ठ शिक्षकों को छोड़कर चहेतों को फायदा पहुंचाने के पीछे की मंशा क्या थी?

दोषी अधिकारियों पर गिरेगी गाज

​सरकार अब उन जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित करने में जुट गई है जिनकी देखरेख में यह अवैध प्रमोशन प्रक्रिया पूरी हुई थी। शासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि:​पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच चल रही है।​जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई (Departmental Action) के साथ-साथ उनके सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि भी दर्ज की जा सकती है।​भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए डिजिटल डेटा और पारदर्शी प्रणाली को और मजबूत किया जा रहा है।

शिक्षकों और विभाग में असंतोष

​प्रमोशन रद्द होने से उन शिक्षकों में भारी निराशा है जिनके आदेश जारी हो चुके थे, वहीं दूसरी ओर विभाग के ईमानदार कैडर ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस कार्रवाई से विभाग में मेरिट और सीनियरिटी का सम्मान बहाल होगा।

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