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High Court Warning: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, बस्ती के SP डॉ. यशवीर सिंह को अवमानना की कड़ी चेतावनी; जानें क्या है पूरा मामला

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High Court Warning: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, बस्ती के SP डॉ. यशवीर सिंह को अवमानना की कड़ी चेतावनी; जानें क्या है पूरा मामला

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक आदेशों की अनदेखी और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर बस्ती जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) डॉ. यशवीर सिंह के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने एक मामले में विवेचना अधिकारी (IO) को निलंबित किए जाने पर नाराजगी जताते हुए एसपी को अवमानना की कड़ी चेतावनी जारी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला, तो पुलिस कप्तान के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाएगी।

क्या है पूरा विवाद?

​मामला एक विवेचना अधिकारी के निलंबन से जुड़ा है। दरअसल, विवेचना अधिकारी ने एसीजेएम (ACJM) कोर्ट से एनबीडब्ल्यू (गैर-जमानती वारंट) हासिल किया था। न्यायिक प्रक्रिया के तहत की गई इस कार्रवाई से नाराज होकर एसपी बस्ती डॉ. यशवीर सिंह ने उक्त अधिकारी को निलंबित कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस निलंबन को सीजेएम कोर्ट के आदेश की अवमानना माना है।

डिवीजन बेंच ने मांगा व्यक्तिगत हलफनामा

​इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने की। रत्नेश शुक्ला नामक व्यक्ति द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एसपी बस्ती को आदेश दिया है कि वे मामले में अपना व्यक्तिगत हलफनामा (Personal Affidavit) दाखिल करें।

कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य बिंदु रखे:​एसपी को हलफनामे में यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर किन परिस्थितियों में जांच अधिकारी को निलंबित किया गया।​न्यायिक आदेश (NBW लेने) का पालन करने वाले अधिकारी पर दंडात्मक कार्रवाई क्यों की गई?यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो कोर्ट अवमानना अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई करेगा।

10 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

​हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए 10 अप्रैल की तिथि निर्धारित की है। यह मामला पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के बीच सामंजस्य और न्यायिक आदेशों की सर्वोपरिता को लेकर एक नजीर पेश कर सकता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी कोर्ट के आदेश के अनुपालन में कदम उठाता है, तो विभाग द्वारा उसे दंडित करना सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जाता है।

प्रमुख अधिकारियों पर हालिया कार्रवाई

​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल के वर्षों में कई वरिष्ठ IAS, IPS और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है या अवमानना के नोटिस जारी किए हैं:​बस्ती एसपी डॉ. यशवीर सिंह (ताज़ा मामला): जैसा कि आपने उल्लेख किया, कोर्ट ने विवेचना अधिकारी को निलंबित करने पर एसपी को कड़ी चेतावनी दी है और इसे न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना है।​प्रमुख सचिव और जिलाधिकारी (DMs): पिछले कुछ समय में नोएडा, लखनऊ और प्रयागराज के जिलाधिकारियों को भी विभिन्न मामलों (जैसे भूमि अधिग्रहण मुआवजा या पेंशन मामले) में आदेश न मानने पर अवमानना की कार्यवाही का सामना करना पड़ा है।​पुलिस विभाग: विवेचना में देरी, गिरफ्तारी के नियमों का उल्लंघन और कोर्ट द्वारा दिए गए सुरक्षा निर्देशों का पालन न करने पर कई बार पुलिस कप्तानों (SSPs/SPs) को नोटिस दिए गए हैं।

2. ऐसे मामलों की संख्या और प्रकृति

​हाईकोर्ट में अवमानना के मामले मुख्य रूप से इन तीन कारणों से होते हैं:​पेंशन और सेवा लाभ: रिटायर कर्मचारियों के लाभ रोकने के सैकड़ों मामले हर साल अवमानना की श्रेणी में आते हैं।​अवैध कब्जा और अतिक्रमण: कोर्ट द्वारा अतिक्रमण हटाने के आदेश के बावजूद कार्रवाई न करने पर अधिकारियों को नोटिस दिए जाते हैं।​भूमि मुआवजा: किसानों या ज़मीन मालिकों को समय पर पैसा न देने पर प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ वारंट तक जारी हुए हैं।

3. सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और SOP

​इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अधिकारियों को बार-बार तलब करने और अवमानना की कार्यवाही करने पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी।​SOP जारी: जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक Standard Operating Procedure (SOP) जारी किया, जिसमें कहा गया कि हाईकोर्ट्स को अधिकारियों को केवल तभी व्यक्तिगत रूप से बुलाना चाहिए जब वह अनिवार्य हो।​अनावश्यक उत्पीड़न पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए, बशर्ते वे जानबूझकर आदेश की अनदेखी न कर रहे हों।

महत्वपूर्ण आंकड़े (अनुमानित)

​इलाहाबाद हाईकोर्ट (प्रयागराज और लखनऊ बेंच) में हजारों की संख्या में अवमानना याचिकाएं लंबित हैं। यूपी सरकार अक्सर कोर्ट में यह स्वीकार करती रही है कि उसके खिलाफ सबसे ज्यादा अवमानना के मामले दर्ज होते हैं, जिसका मुख्य कारण फाइलों का देरी से आगे बढ़ना और बजट की उपलब्धता न होना बताया जाता है।

: उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती बन गई है। हाईकोर्ट का सख्त रवैया शासन को जवाबदेह बनाने के लिए जरूरी है, वहीं दूसरी ओर अधिकारियों का तर्क होता है कि प्रशासनिक जटिलताओं के कारण आदेश लागू करने में समय लगता है।

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