Smart Meter Problem: मऊ में स्मार्ट मीटर बना सिरदर्द, ऊर्जा मंत्री के गृह जनपद में उपभोक्ताओं की बढ़ी मुसीबत
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Smart Meter Problem: मऊ में स्मार्ट मीटर बना सिरदर्द, ऊर्जा मंत्री के गृह जनपद में उपभोक्ताओं की बढ़ी मुसीबत
मऊ/गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में बिजली बिलिंग प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी बनाने के दावे के साथ लगाए गए Smart Meters अब उपभोक्ताओं के लिए जी का जंजाल बन चुके हैं। तकनीकी खामियों, गलत बिलिंग और बिना किसी सूचना के बिजली कटने जैसी समस्याओं ने आम जनता को बेहाल कर दिया है। मऊ के बिजली दफ्तरों में रोजाना सैकड़ों की संख्या में उपभोक्ता अपनी शिकायतों का अंबार लेकर पहुँच रहे हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर त्वरित समाधान न मिलने से आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
स्मार्ट मीटर की तकनीकी खामियों के कारण उपभोक्ता अब इसे राहत के बजाय एक बड़ी मुसीबत मान रहे हैं।
मऊ जिले में बिजली विभाग ने दावा किया था कि स्मार्ट मीटर लगने से Over-billing की समस्या खत्म हो जाएगी और उपभोक्ताओं को रियल-टाइम डेटा मिलेगा। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है। रतनपुरा ब्लॉक के निवासी सुरेंद्र कुमार की आपबीती इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण है। सुरेंद्र ने बताया कि उन्होंने अपने पिता के नाम वाले कनेक्शन का ₹27,434 का पुराना बकाया OTS Scheme के तहत जमा कर खाता शून्य कर लिया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनके बिल में दोबारा फर्जी बकाया जुड़ गया।
एकमुश्त समाधान योजना (OTS) के तहत बिल चुकाने के बाद भी दोबारा बकाया राशि दिखना विभागीय लापरवाही की पराकाष्ठा है।
सुरेंद्र कुमार के अनुसार, उन्होंने ₹7,084 के नए बिल में ₹1,500 एडवांस जमा किए थे ताकि कोई तकनीकी दिक्कत न आए। इसके बावजूद जब उन्होंने दोबारा चेक किया, तो उनके खाते में ₹6,689 का पुराना बकाया फिर से जोड़ दिया गया और मीटर बैलेंस माइनस 21.3 रुपये दिखाने लगा। जब वह इस समस्या को लेकर सब-स्टेशन पहुँचे, तो विभागीय कर्मियों ने रीडिंग मिलान के बाद स्वीकार किया कि बिलिंग में गड़बड़ी हुई है। हालांकि, फॉर्म भरवाने और शिकायतों के बावजूद अब तक उन्हें इस गड़बड़ी से पूरी तरह राहत नहीं मिली है।
ऊर्जा मंत्री के गृह जनपद में बिजली विभाग की ऐसी लचर कार्यप्रणाली प्रदेश की पूरी बिजली व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि मऊ UP Energy Minister का गृह जनपद है। सुरेंद्र कुमार ने सवाल उठाया कि यदि मंत्री जी के अपने क्षेत्र में जागरूकता के बावजूद उपभोक्ताओं को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, तो ग्रामीण और कम पढ़े-लिखें लोगों के साथ क्या हो रहा होगा? विभाग के कार्यालयों में ऐसे सैकड़ों उपभोक्ता मिल जाएंगे जो केवल सॉफ्टवेयर की गलती के कारण हजारों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ झेलने को मजबूर हैं।
बिना पुख्ता सॉफ्टवेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के स्मार्ट मीटर को थोपना आम जनता के लिए मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना साबित हो रहा है।
स्मार्ट मीटर की इन गड़बड़ियों ने Government’s Digital India और पारदर्शिता के संकल्प पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। सरकार की मंशा अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सुविधा देने की है, लेकिन विभागीय भ्रष्टाचार और तकनीकी खामियाँ इस मिशन को बाधित कर रही हैं। उपभोक्ताओं का साफ कहना है कि यदि ‘स्मार्ट’ होने का मतलब गलत बिलिंग और बेवजह की भागदौड़ है, तो पुरानी व्यवस्था ही बेहतर थी। अब देखना होगा कि शासन इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर कब तक दोषियों पर कार्रवाई और व्यवस्था में सुधार करता है।
डिजिटल बिलिंग के नाम पर उपभोक्ताओं का आर्थिक शोषण रोकना अब प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
संवाददाता: अकील अहमद (बहादुरगंज, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश)
