तुष्टिकरण की राजनीति और खाकी का संघर्ष – जब रक्षक ही भक्षक के निशाने पर आए
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तुष्टिकरण की राजनीति और खाकी का संघर्ष – जब रक्षक ही भक्षक के निशाने पर आए
देहरादून/मुरादाबाद। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता ही कानून के राज की आधारशिला होती है, लेकिन जब राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं और तुष्टिकरण की नीति कर्तव्यों पर हावी होने लगे, तो परिणाम न केवल भयावह होते हैं, बल्कि सुरक्षा तंत्र का मनोबल भी तोड़ देते हैं। 6 जुलाई 2011 को मुरादाबाद के मैनाठेर में हुई घटना और आज, 27 मार्च 2026 को आए अदालती फैसले ने एक बार फिर राजनीति और न्याय के बीच के उस धुंधले गलियारे को स्पष्ट कर दिया है, जहाँ ‘सत्ता’ अपराधियों को ढाल बनाती है और ‘न्याय’ अंततः सत्य को उजागर करता है।
मैनाठेर कांड: साजिश और कायरता की दास्तां
आज से करीब 15 साल पहले मुरादाबाद में जो हुआ, वह केवल एक भीड़ का हंगामा नहीं, बल्कि वर्दी पर किया गया एक सुयोजित प्रहार था। तत्कालीन डीआईजी/एसएसपी अशोक कुमार सिंह और जिलाधिकारी राजशेखर जब मौके पर पहुँचे, तो भीड़ ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। विडंबना देखिए कि जहाँ एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (अशोक कुमार सिंह) और एसआई रवि कुमार मौत से जूझ रहे थे, वहीं जिले के मुखिया जिलाधिकारी राजशेखर गाड़ी मोड़कर भाग निकले। इतना ही नहीं, डीआईजी की एस्कॉर्ट और सुरक्षा घेरा भी उन्हें भीड़ के बीच मरणासन्न छोड़कर चला गया। यह प्रशासनिक कायरता का वह काला अध्याय था, जिसने खाकी के विश्वास को हिलाकर रख दिया था।
सत्ता का संरक्षण और न्याय का संघर्ष
2012 में सत्ता परिवर्तन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस तरह से इस मामले में हस्तक्षेप किया, वह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा थी। पुलिस की गाड़ियों में आगजनी, हथियारों की लूट और पीएसी पर हमले जैसे गंभीर मुकदमों को ‘अपनों’ को बचाने के लिए वापस लेने की कोशिश की गई। जिन सुरक्षाकर्मियों को कायरता के आरोप में बर्खास्त किया गया था, उन्हें न केवल बहाल किया गया बल्कि नोएडा और गाजियाबाद जैसी ‘मलाईदार’ पोस्टिंग से नवाजा गया। वहीं, मौके से भागने वाले जिलाधिकारी को राजधानी लखनऊ की कमान सौंप दी गई।
यह सत्ता का वह स्वरूप था जहाँ एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ आईपीएस अधिकारी के जीवन की कोई कीमत नहीं थी। यही पैटर्न 2013 में भी दिखा जब आतंकवादियों के खिलाफ दर्ज 14 चार्जशीट वापस लेने का प्रयास हुआ, जिसे अंततः न्यायालय ने रोक दिया और दोषियों को फांसी व आजीवन कारावास की सजा हुई।
व्यक्तिगत प्रताड़ना और प्रतिशोध की राजनीति
तुष्टिकरण की इस आग ने केवल व्यवस्था को ही नहीं झुलसाया, बल्कि उन अधिकारियों को भी निशाना बनाया जिन्होंने ईमानदारी से अपना धर्म निभाया। मई 2013 में आतंकी खालिद मुजाहिद की मौत के मामले में जिस तरह पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और अन्य 38 पुलिसकर्मियों पर हत्या का फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया, वह प्रतिशोध की राजनीति का सबसे निकृष्ट उदाहरण था।
अदालत का फैसला: नैतिकता का तमाचा
आज मुरादाबाद की अदालत ने 16 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता की लाठी भले ही कुछ समय के लिए न्याय का रास्ता रोक ले, लेकिन कानून के हाथ अंततः गुनहगारों के गिरेबान तक पहुँच ही जाते हैं।
अखिलेश यादव जी को आज आत्मचिंतन करना चाहिए। एक तरफ वह प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं और दूसरी तरफ उनकी सरकार का इतिहास अपराधियों और दंगाइयों को संरक्षण देने वाला रहा है। नैतिकता के नाते उन्हें उन पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों से माफी मांगनी चाहिए, जिनके जीवन और सम्मान के साथ उनकी सरकार ने खिलवाड़ किया। यह फैसला केवल 16 अपराधियों की सजा नहीं है, बल्कि उन तमाम राजनीतिक प्रयासों की हार है जो अपराधियों को धर्म और वोट बैंक के चश्मे से देखते हैं।
