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SP2027 का शंखनाद: दादरी की रैली , अखिलेश यादव की ‘करो या मरो’ की रणनीति

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SP2027 का शंखनाद: दादरी की रैली , अखिलेश यादव की ‘करो या मरो’ की रणनीति

​दादरी

उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र आज नोएडा का दादरी बन गया है। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एशिया के सबसे बड़े एयरपोर्ट (जेवर) को राष्ट्र को समर्पित कर विकास का ‘ट्रिपल इंजन’ मॉडल पेश किया है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दादरी की धरती से 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है। 10 साल के सत्ता से वनवास को खत्म करने के लिए सपा अब नए कलेवर और नई रणनीति के साथ मैदान में है।

1. 2017 और 2022 की हार से लिया गया सबक

​सपा के लिए 2027 महज एक चुनाव नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। 2017 में बीजेपी की प्रचंड लहर और 2022 में कड़ी टक्कर के बावजूद सत्ता से दूर रहने वाली सपा के लिए यह ‘करो या मरो’ की स्थिति है। पिछले दो विधानसभा चुनावों की शिकस्त ने अखिलेश यादव को यह सिखाया है कि केवल ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के भरोसे लखनऊ की गद्दी नहीं जीती जा सकती।

​हालाँकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने सपा में नई जान फूँक दी है। उत्तर प्रदेश में 37 से अधिक सीटें जीतकर सपा ने न केवल बीजेपी के विजय रथ को रोका, बल्कि खुद को राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में पुनर्जीवित किया। दादरी की रैली इसी आत्मविश्वास को जमीन पर उतारने की एक कोशिश है।

2. ‘PDA’ से आगे: ‘ब्राह्मण कार्ड’ और समावेशी रणनीति

​अखिलेश यादव ने इस बार अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। जहाँ एक ओर वे PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों को साधने के लिए उन्होंने माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया है।

  • रणनीतिक महत्व: माता प्रसाद पांडेय जैसे अनुभवी ब्राह्मण चेहरे को आगे करके सपा ने यह संदेश दिया है कि वह केवल एक या दो समुदायों की पार्टी नहीं है। दादरी और पश्चिमी यूपी के इस क्षेत्र में जहाँ गुर्जर, राजपूत और ब्राह्मण मतदाताओं की बहुलता है, अखिलेश का यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल बीजेपी के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने का बड़ा हथियार बन सकता है।

3. स्थानीय मुद्दे बनाम राष्ट्रीय गौरव

​प्रधानमंत्री मोदी ने जेवर एयरपोर्ट के जरिए विकास का जो बड़ा कैनवास खींचा है, अखिलेश यादव उसके जवाब में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महिला सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों को ढाल बना रहे हैं। सपा का मानना है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बीच आम आदमी की रोजी-रोटी और सुरक्षा के सवाल कहीं खो गए हैं। दादरी की रैली में अखिलेश ने इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरकर यह संकेत दिया है कि 2027 का चुनाव ‘भव्यता’ बनाम ‘जनता की बुनियादी जरूरत’ पर लड़ा जाएगा।

4. कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार

​सपा का 10 साल का वनवास कार्यकर्ताओं के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। दादरी की रैली का उद्देश्य केवल जनता को संबोधित करना नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं में वह ‘धार’ पैदा करना है जो चुनाव के समय बूथ स्तर पर बीजेपी की मशीनरी का मुकाबला कर सके। अखिलेश जानते हैं कि यदि 2027 हाथ से निकला, तो पार्टी के लिए वापसी की राह और भी कठिन हो जाएगी।

​दादरी की यह रैली इस बात का प्रमाण है कि अखिलेश यादव अब रक्षात्मक (Defensive) नहीं, बल्कि आक्रामक (Aggressive) राजनीति कर रहे हैं। 2024 की सफलता ने उन्हें वह ब्लूप्रिंट दे दिया है, जिस पर चलकर वे 2027 की वैतरणी पार करना चाहते हैं। जातीय समीकरण, ब्राह्मण कार्ड और जनहित के मुद्दों का यह मिश्रण क्या सपा का वनवास खत्म कर पाएगा? यह तो समय बताएगा, लेकिन दादरी के शंखनाद ने उत्तर प्रदेश की सियासी तपिश को समय से पहले ही बढ़ा दिया है।

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