BSP Mission 2027: बसपा की अहम बैठक आज, क्या मायावती का नया ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला दिला पाएगा खोई हुई सियासी जमीन?
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मिशन 2027: बसपा की अहम बैठक आज, क्या मायावती का नया ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला दिला पाएगा खोई हुई सियासी जमीन?
लखनऊ (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी किंगमेकर और पूर्ण बहुमत वाली सरकार चलाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। मिशन 2027 की तैयारियों को लेकर मायावती ने आज लखनऊ में प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की बड़ी बैठक बुलाई है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा 2012 के बाद से लगातार गिरते वोट शेयर को रोकना और समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ व भाजपा के ‘हिंदुत्व+विकास’ मॉडल के बीच अपना तीसरा रास्ता तैयार करना है।
दशक भर का सूखा: 2012 से 2024 तक का सफर
बसपा के लिए चुनावी आंकड़े पिछले 12 सालों से चिंताजनक रहे हैं। 2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। 2022 में तो बसपा महज एक सीट पर सिमट गई। वहीं, लोकसभा चुनावों की बात करें तो 2014 में पार्टी का खाता नहीं खुला, 2019 में गठबंधन के सहारे 10 सीटें मिलीं, लेकिन 2024 के चुनाव में बसपा फिर से शून्य पर आ गई। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बसपा का ‘कोर कैडर’ वोट बैंक भी अब बिखरता नजर आ रहा है।
PDA और आजाद समाज पार्टी की चुनौती
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में बसपा के सामने दोहरी चुनौती है:सपा का PDA कार्ड: अखिलेश यादव ने ‘पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक’ (PDA) का नारा देकर बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की है। 2024 के नतीजों ने साबित किया कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर शिफ्ट हुआ है।चंद्रशेखर आजाद का उदय: नगीना सीट से जीत दर्ज कर चंद्रशेखर आजाद ने खुद को दलित राजनीति के नए चेहरे के तौर पर पेश किया है। ‘आजाद समाज पार्टी’ का बढ़ता ग्राफ बसपा के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि युवा दलित मतदाता आक्रामक राजनीति की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
सोशल इंजीनियरिंग 2.0: क्या होगा नया प्लान?
आज की बैठक में मायावती नए समीकरणों पर फोकस कर सकती हैं। बसपा अब केवल ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के पुराने नारों पर निर्भर नहीं रह सकती। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी अब ‘कैडर कैंप’ के जरिए युवाओं को जोड़ने और स्थानीय स्तर पर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति बना रही है।ब्राह्मण + दलित गठजोड़ की वापसी? क्या बसपा फिर से 2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला अपनाएगी या फिर अति पिछड़ों और मुसलमानों को जोड़ने के लिए कोई नया प्रयोग करेगी?आकाश आनंद की भूमिका: पार्टी के उत्तराधिकारी आकाश आनंद को फिर से सक्रिय करना और उन्हें युवाओं के बीच आक्रामक प्रचार की जिम्मेदारी देना बसपा की नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
भाजपा का ‘विकास और हिंदुत्व’ बनाम बसपा का ‘नीला झंडा’
भाजपा जहां एक तरफ लाभार्थी वर्ग और हिंदुत्व के एजेंडे पर मजबूती से आगे बढ़ रही है, वहीं बसपा के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि वह भाजपा की ‘बी-टीम’ नहीं है। 2027 के लिए बसपा को यह संदेश देना होगा कि दलितों और वंचितों के हितों की रक्षा केवल नीला झंडा ही कर सकता है।
अस्तित्व की लड़ई
बसपा के लिए 2027 का चुनाव महज एक चुनाव नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक वजूद को बचाने की लड़ाई है। यदि आज की बैठक से कोई ठोस और धरातलीय रणनीति नहीं निकली, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह ‘तीसरा कोना’ पूरी तरह से सपा-भाजपा की द्विध्रुवीय लड़ाई में तब्दील हो सकता है। मायावती का अगला कदम ही तय करेगा कि ‘हाथी’ एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता की ओर कदम बढ़ाएगा या नहीं।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का भारतीय राजनीति में उदय एक सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन के रूप में हुआ। इसकी स्थापना 14 अप्रैल 1984 को बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर मान्यवर कांशीराम द्वारा की गई थी। पार्टी का मुख्य उद्देश्य ‘बहुजन समाज’ (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यक) को संगठित कर उन्हें राजनीतिक सत्ता की ‘मास्टर चाबी’ दिलाना था। कांशीराम ने बामसेफ (BAMCEF) और डीएस-4 (DS4) जैसे संगठनों के माध्यम से जो जमीन तैयार की थी, उसे बसपा ने एक मजबूत राजनीतिक मंच प्रदान किया।
उत्तर प्रदेश की सत्ता में बसपा का सफर बेहद प्रभावशाली और ऐतिहासिक रहा है। पार्टी ने यूपी में कुल चार बार सरकार बनाई। मायावती पहली बार जून 1995 में भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं, जो किसी भी दलित महिला के लिए देश में एक मिसाल था। इसके बाद 1997 और 2002 में भी बसपा ने गठबंधन सरकारों का नेतृत्व किया। हालांकि, बसपा के इतिहास का स्वर्ण युग 2007 का विधानसभा चुनाव रहा, जब पार्टी ने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (दलित-ब्राह्मण गठजोड़) के दम पर पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और 2012 तक अपना पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया।
वर्चस्व और विस्तार की दृष्टि से बसपा का नेटवर्क उत्तर प्रदेश के बाहर भी कई राज्यों में काफी सक्रिय रहा है। बसपा भारत की उन चुनिंदा पार्टियों में से है जिसने लंबे समय तक ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा बरकरार रखा। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बसपा का एक निश्चित वोट बैंक और राजनीतिक प्रभाव रहा है। विशेष रूप से मध्य प्रदेश के चंबल-ग्वालियर क्षेत्र और पंजाब के दोआबा क्षेत्र में बसपा ने कई बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी ताकत दिखाई है। हालांकि, वर्तमान में पार्टी के सामने अपने इस अखिल भारतीय नेटवर्क को फिर से जीवित करने की बड़ी चुनौती है।
