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सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार की बड़ी जीत: हल्द्वानी बनभूलपुरा दंगों के आरोपियों की जमानत रद्द, 2 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

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सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार की बड़ी जीत: हल्द्वानी बनभूलपुरा दंगों के आरोपियों की जमानत रद्द, 2 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

नई दिल्ली/देहरादून: उत्तराखंड राज्य के विधिक इतिहास और कानून-व्यवस्था की मजबूती के दृष्टिकोण से 4 मई 2026 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ। देश की सर्वोच्च अदालत ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा दंगों के मुख्य आरोपियों की ‘डिफॉल्ट जमानत’ को निरस्त करते हुए राज्य सरकार की दलीलों पर अपनी मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से न केवल अपराधियों के हौसले पस्त हुए हैं, बल्कि देवभूमि की पुलिस और अभियोजन विभाग के मनोबल को भी एक नई ऊंचाई मिली है।

न्यायालय की कड़ी टिप्पणी: “हाईकोर्ट की दिशा गलत थी”

​माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने उत्तराखंड राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट के पूर्व के आदेश को पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट का दृष्टिकोण न केवल तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण था, बल्कि वह “गलत दिशा” में आगे बढ़ा।

​न्यायालय ने इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया कि हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर जो प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं, वे तथ्यात्मक रूप से निराधार थीं। शीर्ष अदालत ने माना कि जांच एजेंसी ने इस बेहद जटिल और संवेदनशील मामले में, जिसमें सैकड़ों आरोपी और गवाह शामिल थे, अत्यंत तेजी और दक्षता के साथ कार्य किया है।

क्या था पूरा मामला?

​8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में अवैध अतिक्रमण हटाने के दौरान एक हिंसक भीड़ ने कानून-व्यवस्था को चुनौती दी थी। इस दंगे में:पुलिस दल पर अंधाधुंध फायरिंग और पथराव किया गया।​पुलिस वाहनों को पेट्रोल बमों से आग के हवाले कर दिया गया।​महिला कांस्टेबलों को थाने के भीतर बंद कर पूरे थाने को फूंकने का प्रयास हुआ।

​इस जघन्य अपराध के लिए आरोपियों पर IPC, आर्म्स एक्ट और आतंकवाद विरोधी कानून UAPA (धारा 15 एवं 16) के तहत गंभीर मुकदमे दर्ज किए गए थे। मुख्य आरोपी जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को हाईकोर्ट से मिली डिफॉल्ट जमानत को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

राज्य की ओर से प्रभावी पैरवी

​सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड का पक्ष उप महाधिवक्ता श्री जतिंदर कुमार सेठी एवं स्टैंडिंग काउंसिल श्री आशुतोष कुमार शर्मा ने अत्यंत मजबूती से रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपियों ने समय विस्तार और जमानत खारिज होने के आदेशों को समय पर चुनौती नहीं दी, बल्कि जानबूझकर दो महीने तक प्रतीक्षा की।

​सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपियों ने अपने आचरण के कारण ‘डिफॉल्ट जमानत’ मांगने का वैधानिक अधिकार खो दिया था। न्यायालय ने आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का सख्त निर्देश दिया है। निर्देश न मानने की स्थिति में ट्रायल कोर्ट को उन्हें तत्काल हिरासत में लेने के लिए स्वतंत्र किया गया है।

राज्य सरकार और पुलिस के लिए ‘नैतिक जीत’

​इस फैसले को उत्तराखंड शासन और अभियोजन विभाग एक बड़ी विधिक विजय के रूप में देख रहा है। यह मामला केवल जमानत रद्द होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सरकारी तंत्र की गरिमा की बहाली है, जिस पर दंगाइयों ने हमला किया था।

मुख्य बिंदु जो जीत सुनिश्चित कर गए:त्वरित जांच: सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यक्षमता की सराहना की।​तथ्यात्मक स्पष्टता: हाईकोर्ट द्वारा जांच प्रक्रिया पर की गई टिप्पणी को सर्वोच्च अदालत ने खारिज किया।​कानून का इकबाल: अतिक्रमण विरोधी अभियान और कानून व्यवस्था बनाए रखने के राज्य के अधिकार को मान्यता मिली।

​इस निर्णय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि खाकी पर हाथ उठाने वाले और राज्य की शांति भंग करने वाले तत्वों को कानून की बारीकियों का अनुचित लाभ नहीं लेने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए यह फैसला ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की एक बड़ी जीत है।

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