लाटू देवता मंदिर में पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध: वाण गांव का ऐतिहासिक और प्रगतिशील निर्णय
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लाटू देवता मंदिर में पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध: वाण गांव का ऐतिहासिक और प्रगतिशील निर्णय
देवाल (चमोली), उत्तराखंड।
देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक परंपराओं और लोक मान्यताओं के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सुधारवादी अध्याय जुड़ा है। जनपद चमोली के देवाल विकासखंड के अंतर्गत स्थित प्रसिद्ध वाण गांव के ग्रामीणों ने एक स्वर में ऐतिहासिक फैसला लेते हुए लाटू देवता मंदिर में सदियों से चली आ रही पशु बलि प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया है। मंदिर समिति और ग्रामीणों की साझा बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया यह निर्णय न केवल आस्था के स्वरूप को सात्विक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी परिचायक है।
अब केवल सात्विक पूजा-अर्चना: आस्था का नया स्वरूप
लाटू देवता मंदिर परिसर में आयोजित इस विशेष बैठक में मंदिर समिति के पदाधिकारियों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने गहन विचार-विमर्श के बाद यह तय किया कि अब मंदिर की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार की पशु बलि नहीं दी जाएगी।
समिति के अनुसार, जो श्रद्धालु अपनी मनौती (मन्नत) पूरी होने पर बलि चढ़ाते थे, वे अब केवल सात्विक पद्धति से ही पूजा-अर्चना करेंगे। इसमें फल, पुष्प, और पारंपरिक मिष्ठान के साथ अनुष्ठान संपन्न किए जाएंगे। ग्रामीणों का मानना है कि समय के साथ धार्मिक परंपराओं में मानवीय मूल्यों और सकारात्मक बदलावों का समावेश होना अनिवार्य है। इस निर्णय से न केवल मंदिर परिसर की स्वच्छता और गरिमा बढ़ेगी, बल्कि समाज में एक अहिंसक और सकारात्मक संदेश भी जाएगा।
ग्राम प्रधान और प्रशासन की पुष्टि
वाण गांव की ग्राम प्रधान नंदुली देवी ने इस ऐतिहासिक निर्णय की पुष्टि करते हुए इसे सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों और भक्तों ने इस पहल का पूरे उत्साह के साथ स्वागत किया है। मंदिर परिसर को अधिक व्यवस्थित और स्वच्छ बनाने के लिए भी सामूहिक संकल्प लिया गया है। इस निर्णय के बाद क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों ने इसे उत्तराखंड की लोक संस्कृति में ‘सात्विक क्रांति’ के रूप में देखा है।
कौन हैं लाटू देवता? आस्था और लोककथा
लाटू देवता को गढ़वाल और कुमाऊं की अधिष्ठात्री देवी नंदा देवी का धर्म भाई माना जाता है। हिंदू मान्यताओं और लोकगाथाओं के अनुसार, जब नंदा देवी अपनी ससुराल (कैलाश) जाती हैं, तो उनके भाई लाटू देवता उन्हें छोड़ने के लिए साथ चलते हैं।
यही कारण है कि विश्व प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा में लाटू देवता की भूमिका अत्यंत विशिष्ट होती है। यात्रा के दौरान वाण गांव में लाटू देवता का निशान (ध्वज) सबसे आगे चलता है, जो उनके नेतृत्व और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
अनोखी परंपरा: आँखों पर पट्टी बांधकर होती है पूजा
लाटू देवता का मंदिर अपनी अनूठी और रहस्यमयी परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ के गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश वर्जित है।पुजारी की विशेष विधि: जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो मुख्य पुजारी अपनी आँखों और मुँह पर पट्टी बांधकर ही गर्भगृह के भीतर प्रवेश करते हैं।मान्यता: कहा जाता है कि गर्भगृह में साक्षात नागराज विद्यमान रहते हैं और उनकी दिव्य चमक व शक्ति को सामान्य मानव आँखें सहन नहीं कर सकतीं। साथ ही, पुजारी की साँस से देवता की पवित्रता भंग न हो, इसलिए मुँह पर भी पट्टी बांधी जाती है।भक्तों के दर्शन: श्रद्धालु आज भी मंदिर के बाहर से ही पूजा करते हैं; गर्भगृह के भीतर के दर्शन आज तक किसी ने नहीं किए हैं।
सामाजिक सुधार की दिशा में एक मील का पत्थर
वाण गांव का यह निर्णय उत्तराखंड के अन्य शक्तिपीठों और मंदिरों के लिए एक मिसाल बन सकता है। जहाँ एक ओर यहाँ के लोग अपनी सदियों पुरानी संस्कृति और रहस्यों को संजोए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर पशु बलि जैसी प्रथाओं को त्यागकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि धर्म और सुधार साथ-साथ चल सकते हैं।
इस निर्णय से वाण गांव ने स्पष्ट कर दिया है कि लाटू देवता के प्रति उनकी भक्ति अटूट है, लेकिन अब वह भक्ति रक्त से नहीं बल्कि श्रद्धा और सात्विक भाव से प्रकट होगी। इस ऐतिहासिक पहल के बाद अब मंदिर में आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को एक अधिक शांत और अध्यात्मिक वातावरण देखने को मिलेगा।
सोहन सिंह रिपोर्ट, चमोली।
