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UP New DGP News: यूपी को जल्द मिलेगा स्थाई डीजीपी; 1990-94 बैच के IPS रेस में, जानें वरिष्ठता सूची और समीकरण

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UP New DGP News: यूपी को जल्द मिलेगा स्थाई डीजीपी; 1990-94 बैच के IPS रेस में, जानें वरिष्ठता सूची और समीकरण

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को नया शीर्ष नेतृत्व देने की तैयारी तेज हो गई है। लंबे समय से कार्यवाहक डीजीपी के भरोसे चल रहे प्रदेश को जल्द ही एक स्थाई पुलिस महानिदेशक (DGP) मिलने जा रहा है। शासन स्तर पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजने के लिए नया प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है, जिसमें वरिष्ठता और अनुभव को प्राथमिकता दी गई है।

UPSC को भेजा जा रहा नया प्रस्ताव: 2025 की गाइडलाइन पर नजर

​उत्तर प्रदेश शासन जल्द ही संघ लोक सेवा आयोग को आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजेगा। इस बार के प्रस्ताव में 1990 से लेकर 1994 बैच तक के वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के नाम शामिल किए गए हैं। खास बात यह है कि इस प्रस्ताव को आयोग द्वारा पहले लगाई गई आपत्तियों का निस्तारण करते हुए 2025 की नई गाइडलाइन के अनुसार तैयार किया गया है।

​प्रस्ताव मिलने के बाद UPSC तीन अधिकारियों के नाम का एक पैनल वापस राज्य सरकार को भेजेगा, जिनमें से मुख्यमंत्री एक नाम पर मुहर लगाकर स्थाई डीजीपी नियुक्त करेंगे।

वरिष्ठता सूची में कौन हैं सबसे ऊपर? (Top IPS Officers in Seniority)

​डीजीपी पद के लिए जिन अधिकारियों के नाम चर्चा में हैं और जो वरिष्ठता सूची (Seniority List) में सबसे ऊपर बताए जा रहे हैं, उनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:​राजीव कृष्ण (1991 बैच): वर्तमान में कार्यवाहक डीजीपी के रूप में कार्यरत। माना जा रहा है कि सरकार की पहली पसंद और प्रबल दावेदार वही हैं।​पी.वी. रामाशास्त्री (1989/90 बैच): इनकी गिनती बेहद अनुभवी और ईमानदार अधिकारियों में होती है।​संदीप सालुंके (1990 बैच): वरिष्ठता सूची में इनका नाम काफी ऊपर है।​प्रशांत कुमार (1990 बैच): कानून व्यवस्था में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं।​तिलोतमा वर्मा/एन.आर. पद्मजा: महिला अधिकारियों में वरिष्ठता के आधार पर इनका नाम भी पैनल की चर्चा में रह सकता है।नोट: नियमानुसार 30 साल की सेवा पूरी करने वाले और कम से कम 6 महीने का सेवाकाल शेष रखने वाले अधिकारियों पर ही विचार होता है।

क्यों फंसा हुआ है स्थाई नियुक्ति का पेंच?

​यूपी में पिछले कई सालों से स्थाई डीजीपी की नियुक्ति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसका मुख्य कारण UPSC की आपत्तियां और सेवा विस्तार की गाइडलाइंस रही हैं। सरकार बार-बार केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भेजती रही है, लेकिन वरिष्ठता सूची में कुछ अधिकारियों के केंद्र में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर होने और कुछ के सेवानिवृत्ति के करीब होने के कारण तकनीकी पेच फंसता रहा है।

​सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले के निर्देशों के अनुसार, डीजीपी का कार्यकाल कम से कम 2 साल का होना चाहिए। इसी नियम के तहत UPSC उन नामों पर आपत्ति जताता रहा है जिनका कार्यकाल कम बचा था।

विधानसभा चुनाव से पहले नियुक्ति का महत्व

​उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा सरकार किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहती। चुनाव आयोग के कड़े नियमों के तहत चुनाव के दौरान एक स्थाई और पूर्णकालिक पुलिस प्रमुख का होना कानून व्यवस्था के प्रबंधन के लिए अनिवार्य हो जाता है। यही कारण है कि शासन स्तर पर इस बार एक्सरसाइज को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द नियुक्ति की अधिसूचना जारी हो सके।

नए डीजीपी के सामने चुनौतियां

​स्थाई डीजीपी के रूप में जो भी कमान संभालेगा, उनके सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां होंगी:​अपराध नियंत्रण: यूपी जैसे बड़े राज्य में संगठित अपराध और महिला सुरक्षा पर लगाम लगाना पहली प्राथमिकता होगी।​चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न कराना: आगामी चुनाव के दौरान निष्पक्ष और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना।​साइबर अपराध: बढ़ते डिजिटल फ्रॉड से निपटने के लिए पुलिसिंग को हाई-टेक बनाना।​पदानुक्रम  (Hierarchy): नए डीजीपी के बाद अगले उत्तराधिकारी तैयार करना ताकि भविष्य में फिर से ‘कार्यवाहक’ वाली स्थिति पैदा न हो।

​यदि इस बार UPSC से पैनल को हरी झंडी मिल जाती है, तो यूपी को कई सालों के बाद एक ऐसा डीजीपी मिलेगा जो लंबी अवधि तक अपनी रणनीतियों को धरातल पर उतार सकेगा। वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजीव कृष्ण की स्थाई नियुक्ति की प्रबल संभावनाओं के बीच लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज है।

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