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प्लास्टिक मुक्त उत्तराखंड: राजेश्वरी सेमवाल ने छेड़ी ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ के खिलाफ जंग, जन-आंदोलन बनाने की अपील

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प्लास्टिक मुक्त उत्तराखंड: राजेश्वरी सेमवाल ने छेड़ी ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ के खिलाफ जंग, जन-आंदोलन बनाने की अपील

देहरादून। पर्यावरण संरक्षण अब केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे हर नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनना होगा। इसी संकल्प के साथ देहरादून की जानी-मानी पर्यावरण प्रेमी राजेश्वरी सेमवाल ने सिंगल यूज प्लास्टिक (SUP) के खिलाफ एक व्यापक अभियान की शुरुआत की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि हमें देवभूमि को आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखना है, तो प्लास्टिक संस्कृति को जड़ से मिटाना होगा।

पर्यावरण संरक्षण: ‘स्वच्छता ही श्री है’

​राजेश्वरी सेमवाल ने अपने संबोधन में महात्मा गांधी के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि “स्वच्छता ही श्री है।” उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51 क (छ) का हवाला देते हुए याद दिलाया कि वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना हर भारतीय का मौलिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली अपनाना ही आज के समय की सबसे बड़ी देशभक्ति है।

सिंगल यूज प्लास्टिक: एक अदृश्य जहर

​अभियान के दौरान उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि:​मिट्टी की बर्बादी: प्लास्टिक न केवल जीव-जंतुओं को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि धरती की उर्वरा शक्ति को भी नष्ट कर रहा है।​नियमों का उल्लंघन: सरकार द्वारा 120 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद, स्थानीय मंडियों और छोटे व्यापारियों द्वारा इसका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।​कड़े दंड की आवश्यकता: नियमों के उल्लंघन पर ₹1,00,000 तक का जुर्माना और 5 साल की जेल का प्रावधान है, लेकिन धरातल पर इसकी सख्ती नजर नहीं आती।

जमीनी स्तर पर प्रयास: ‘हरित घर’ और ‘इको-फ्रेंडली बैग’

​राजेश्वरी सेमवाल केवल बातों तक सीमित नहीं हैं, उनके कार्यों में ठोस प्रयास झलकते हैं:​हरित घर अभियान: उन्होंने महीने में कम से कम 20 घरों में जाकर और प्रति दिन 10 लोगों को जागरूक करने का लक्ष्य रखा है।​प्लास्टिक बैंक और विकल्प: उन्होंने स्थानीय विकास समितियों के साथ मिलकर सब्जी मंडियों में ‘इको-फ्रेंडली कैरी बैग’ वितरित किए हैं। उनका उद्देश्य प्लास्टिक की जगह जूट, सूती और कपड़े के थैलों को बढ़ावा देना है।​शिक्षण संस्थानों में अलख: सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में जाकर युवाओं को इस मुहिम से जोड़ने का संकल्प लिया है।

एक सामूहिक आह्वान

​उन्होंने गौरा देवी और चिपको आंदोलन की याद दिलाते हुए कहा कि उत्तराखंड की महिलाओं ने हमेशा पर्यावरण की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई है। उन्होंने अपील की कि “हमें समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा बनना है।” यदि हर परिवार घर में प्लास्टिक लाना बंद कर दे, तो फैक्ट्रियां अपने आप बंद हो जाएंगी।

​राजेश्वरी सेमवाल का यह अभियान देहरादून से शुरू होकर पूरे प्रदेश में एक नई चेतना जगा रहा है। उनके साथ पर्यावरण प्रेमियों की एक बड़ी टीम ‘हरित भवन सप्ताह’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से इस लड़ाई को आगे बढ़ा रही

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