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महाकवि कालिदास की कालजयी रचनाओं से गुंजायमान हुआ दून पुस्तकालय, ‘मेघदूत’ और ‘कुमारसंभव’ की प्रस्तुतियों ने मोहा मन

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महाकवि कालिदास की कालजयी रचनाओं से गुंजायमान हुआ दून पुस्तकालय, ‘मेघदूत’ और ‘कुमारसंभव’ की प्रस्तुतियों ने मोहा मन

देहरादून।

राजधानी के सांस्कृतिक गलियारों में आज संस्कृत साहित्य की अनूठी छटा देखने को मिली। Doon Library and Research Centre द्वारा महाकवि कालिदास के जीवन और उनके कृतित्व पर केंद्रित एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस के ‘रजत जयन्ती’ वर्ष (Silver Jubilee) के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में वार्ताओं, श्लोक गायन और शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से कालिदास के ‘ऋतु संसार’ को जीवंत किया गया।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का Grand Showcase

​कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण दून पुस्तकालय का एम्फीथिएटर रहा, जहाँ प्रसिद्ध नृत्यांगना शर्मिला गांगुली भरतरी और उनकी टीम ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने कालिदास रचित मेघदूत, हिमालय प्रशस्ति, कुमार संभव और माँ काली पर आधारित प्रसंगों को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस Cultural Performance को दर्शकों ने खुले मन से सराहा और तालियों की गड़गड़ाहट से रंग मण्डप गूंज उठा। उन्हें शैलेंद्र रावत, बापुन दत्ता और डॉ. नूतन स्मृति ने सहयोग प्रदान किया।

चित्रकला और मधुर श्लोक गायन

​कार्यक्रम के प्रथम चरण में विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों ने संस्कृत के श्लोकों का मधुर गायन कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। वहीं, डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज के छात्रों द्वारा महाकवि कालिदास के चित्रों पर केंद्रित एक Fine Arts Exhibition भी लगाई गई, जो युवाओं की रचनात्मकता का बेहतरीन उदाहरण रही।

विशेषज्ञों का नजरिया: कालिदास और उत्तराखण्ड का नाता

​मुख्य वक्ता डॉ. रामविनय सिंह (प्रोफेसर, डी.ए.वी. पीजी कॉलेज) ने कालिदास के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे विश्व में ‘श्रृंगार’ के सबसे बड़े महाकवि हैं। उन्होंने बताया कि भले ही उनके जन्मस्थान को लेकर मतभेद हों, लेकिन लोक मान्यताओं में उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग स्थित Kaviltha Village को उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि माना जाता है। उन्होंने राजा भोज और कालिदास से जुड़े रोचक प्रसंगों के साथ-साथ अभिज्ञान शाकुन्तलम् के विभिन्न पक्षों को विस्तार से समझाया।

प्रशासनिक और अकादमिक जगत की उपस्थिति

​कार्यक्रम की अध्यक्षता उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पांडेय ने की। उन्होंने खुशी जताई कि देहरादून जैसे आधुनिक शहर में संस्कृत साहित्य की समृद्ध परंपरा पुनः स्थापित हो रही है। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद संस्कृत शिक्षा सचिव श्री दीपक गैरोला ने सरकार द्वारा संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों को रेखांकित किया।

गरिमामयी उपस्थिति

​कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. इन्दु सिंह ने प्रस्तुत की और संचालन डॉ. भारती मिश्रा ने किया। कार्यक्रम के अंत में दून पुस्तकालय के मानद निदेशक श्री एन. रवि शंकर ने अतिथियों और कलाकारों को स्मृति चिन्ह (Souvenirs) भेंट किए।

​इस अवसर पर मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमती राधा रतूड़ी, पूर्व मुख्य सचिव श्री अनिल रतूड़ी, नृप सिंह नपलच्याल, राजीव भरतरी, डॉ. सुशील उपाध्याय सहित शहर के कई प्रसिद्ध लेखक, साहित्यकार और प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे। दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

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