नेपाल बालेन् शाह सरकार को 26 दिन में लगा बड़ा झटका, गृह मंत्री का इस्तीफा home minister resign in Nepal
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नेपाल बालेन् शाह सरकार को 26 दिन में लगा बड़ा झटका, गृह मंत्री का इस्तीफा home minister resign in Nepal
काठमांडू: नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘नायक’ की तरह छवि बनाकर और जन-आंदोलन के दम पर सत्ता के शिखर तक पहुंची सरकार को महज 26 दिनों के भीतर अपने सबसे ताकतवर स्तंभ के टूटने का सामना करना पड़ा है। भारी विवादों और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बीच गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने बुधवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
भ्रष्टाचार विरोधी चेहरा ही घेरे में: क्या हैं आरोप?
सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार पर आक्रामक रुख अपनाने वाले सुदन गुरुंग खुद ही संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के जाल में फंस गए। उन पर लगे आरोपों ने सरकार की शुचिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:
- संदिग्ध निवेश: गुरुंग पर माइक्रो इंश्योरेंस कंपनियों में संदिग्ध तरीके से निवेश करने का आरोप है।
- विवादास्पद कारोबारी संबंध: आरोप है कि उनके संबंध विवादास्पद कारोबारी दीपक भट्टा के साथ रहे हैं और वे व्यापारिक हिस्सेदारी में शामिल थे।
- आय से अधिक संपत्ति: नेपाली मीडिया में ऐसे दस्तावेजों के सार्वजनिक होने का दावा किया गया है, जो उनकी आय से अधिक संपत्ति और संदिग्ध बैंकिंग ट्रांजेक्शन की ओर इशारा करते हैं।
26 दिन में ‘मनमानी’ और ‘नायक’ बनने की चुनौती
नेपाल की यह सरकार जन-आंदोलन की उन उम्मीदों पर सवार होकर आई थी, जहाँ जनता व्यवस्था परिवर्तन और ईमानदारी की आस लगाए बैठी थी। हालांकि, 26 दिनों के कार्यकाल ने यह साबित कर दिया कि सत्ता चलाना आंदोलन करने से कहीं अधिक कठिन है।
जानकारों का मानना है कि सरकार एक ‘नायक’ की छवि गढ़ने के चक्कर में संसदीय नियमों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की अनदेखी कर रही है। जिस तरह से गृह मंत्री ने आनन-फानन में काम किया और फिर खुद ही भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे पाए गए, उससे जनता के बीच यह संदेश गया है कि सरकार जमीनी काम के बजाय ‘मनमानी’ पर अधिक उतारू है।
चौतरफा विरोध और गिरता जन-विश्वास
गुरुंग के खिलाफ न केवल विपक्षी दल बल्कि आम नागरिक और सामाजिक संगठन भी सड़कों पर उतर आए थे। लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों और मीडिया के दबाव के चलते सरकार बैकफुट पर आ गई। अंततः भारी आलोचनाओं के बाद बुधवार को गुरुंग को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा।
चुनौतीपूर्ण भविष्य: महज 26 दिन में एक प्रमुख मंत्री का गिरना सरकार की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जनता अब यह पूछ रही है कि जो सरकार अपने पहले महीने में ही आंतरिक भ्रष्टाचार नहीं रोक पाई, वह 5 साल का कार्यकाल कैसे पूरा करेगी?
निष्कर्ष: उम्मीदों की कसौटी पर सरकार
सत्ता में आना और सत्ता के नियमों का पालन करते हुए जनता का विश्वास बनाए रखना, दो अलग बातें हैं। यदि सरकार इसी तरह विवादों में घिरी रही और वित्तीय शुचिता का पालन नहीं किया गया, तो वह जन-आश्वासन जो आंदोलन के दौरान दिए गए थे, खोखले साबित होंगे।
यह इस्तीफा केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस ‘आंदोलनकारी सोच’ के लिए एक बड़ी चेतावनी है जिसने भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा किया था। अब देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री इस झटके से कैसे उबरते हैं और क्या सरकार अपनी बाकी अवधि में जनता की उम्मीदों पर खरी उतर पाती है या नहीं।
