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उत्तराखंड पुलिस में सनसनी: नेशनल मेडलिस्ट महिला सिपाही के उत्पीड़न मामले को दबाने का आरोप, राज्य महिला आयोग से गुहार

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उत्तराखंड पुलिस में सनसनी: नेशनल मेडलिस्ट महिला सिपाही के उत्पीड़न मामले को दबाने का आरोप, राज्य महिला आयोग से गुहार

देहरादून। उत्तराखंड पुलिस महकमे से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। 37वें नेशनल गेम्स की पदक विजेता और उत्तराखंड पुलिस में तैनात एक स्वर्ण पदक विजेता महिला रिक्रूट आरक्षी (सिपाही) ने अपने ही कोच पर कथित रूप से छेड़छाड़ और मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इस मामले में और भी हैरान करने वाली बात यह है कि पीड़िता द्वारा शिकायत किए जाने के बावजूद पुलिस मुख्यालय के खेल प्रभारी पर मामले को दबाने और उल्टा पीड़िता पर ही दोषारोपण (विक्टिम ब्लेमिंग) करने के गंभीर आरोप लगे हैं।

​इस पूरे प्रकरण को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता नीता सक्सेना ने उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष  कुसुम कण्डवाल को एक औपचारिक पत्र लिखकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

​खेल प्रभारी पर ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ के गंभीर आरोप

​आयोग को भेजे गए पत्र के अनुसार, पीड़िता गायत्री नेगी वर्तमान में पुलिस लाइन देहरादून से संबद्ध होकर 40वीं वाहिनी पीएसी में तैनात हैं। वह एक प्रतिभावान खिलाड़ी हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम रोशन किया है। शिकायत के मुताबिक, उनके कोच द्वारा उनके साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई थी।

​जब महिला खिलाड़ी ने इसकी लिखित शिकायत पुलिस मुख्यालय के स्पोर्ट्स कार्यालय में दर्ज कराई, तो निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय कथित रूप से मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया गया। पत्र में सीधे तौर पर आरोप लगाया गया है कि   खेल  प्रभारी ने शिकायत को उचित स्तर तक पहुंचने ही नहीं दिया। इसके विपरीत, उन्होंने पीड़ित महिला कर्मी पर ही असंवेदनशील टिप्पणियां कीं। आरोप है कि खेल प्रभारी ने पीड़िता से कहा, “तुम उसके साथ होटल में क्यों गईं, गलती तुम्हारी है, कोच की नहीं।” आंतरिक सुरक्षा प्रणाली पर उठे सवाल

पत्र में कहा गया है कि पूछताछ के दौरान महिला खिलाड़ी से बेहद आपत्तिजनक और गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले सवाल पूछे गए, जिससे विभाग में कार्यरत अन्य महिला खिलाड़ियों और कर्मचारियों का मनोबल बुरी तरह टूटा है। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि यही घटना किसी वरिष्ठ अधिकारी की पुत्री या महिला परिजन के साथ हुई होती, तो क्या तब भी शिकायत को इसी तरह दबाया जाता? यह स्थिति उत्तराखंड पुलिस की आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली और महिला सुरक्षा के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

 

​निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की मांग

​हालांकि इस मामले की सूचना पुलिस महानिदेशक (DGP) उत्तराखंड और खेल आईजी स्तर तक भी भेजी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई न होने के कारण अंततः राज्य महिला आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।

​महिला आयोग से निवेदन किया गया है कि:​इस पूरे प्रकरण की तत्काल किसी वरिष्ठ महिला अधिकारी या महिला प्रकोष्ठ के समक्ष सुरक्षित माहौल में निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।​शिकायत दबाने वाले और पीड़िता का मानसिक उत्पीड़न करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।​दोषी अधिकारियों से लिखित रूप में क्षमा याचना कराई जाए और पीड़ित महिला खिलाड़ी को पूरी सुरक्षा दी जाए ताकि उन पर कोई दबाव या प्रतिशोध की कार्रवाई न की जा सके।

​इस पत्र की प्रतिलिपियाँ पुलिस महानिरीक्षक/सचिव (उत्तराखंड पुलिस स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड), खेल सचिव,  खेल मंत्री और डीजीपी/एसएसपी देहरादून को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रेषित की गई हैं। अब देखना यह होगा कि महिला आयोग इस अत्यंत संवेदनशील मामले में क्या कड़ा रुख अपनाता है।

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