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संस्कृत उत्थान की दिशा में ऐतिहासिक पहल: लेखक गाँव और संस्कृत संस्थानों के मध्य एम.ओ.यू.

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संस्कृत उत्थान की दिशा में ऐतिहासिक पहल: लेखक गाँव और संस्कृत संस्थानों के मध्य एम.ओ.यू.

​देहरादून के थानो स्थित लेखक गाँव के अटल प्रेक्षागृह में स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय एवं लेखक गाँव के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय विचार गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। गोष्ठी का मुख्य विषय “भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विकसित भारत में संस्कृत का योगदान” था। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के प्रतिष्ठित संस्कृत संस्थानों और लेखक गाँव के बीच सांस्कृतिक व शैक्षिक आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। कार्यक्रम में शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, राजनीति और अध्यात्म जगत की अनेक नामचीन हस्तियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।

​कार्यक्रम का शुभारंभ और स्वागत सत्र

​समारोह का औपचारिक उद्घाटन मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसके बाद छात्राओं ने अत्यंत सुमधुर सुरों में सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। आगंतुक अतिथियों का स्वागत करते हुए लेखक गाँव की निदेशक विदुषी ‘निशंक’ ने संस्कृत की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि संस्कृत केवल संवाद का माध्यम या एक भाषा मात्र नहीं है, बल्कि यह वेदों की पावन वाणी और श्रीमद्भगवद्गीता का अलौकिक प्रकाश है, जो मानवता का पथ प्रदर्शन करता है।

​मुख्य अतिथियों एवं विद्वानों के सारगर्भित विचार

​कार्यक्रम में उपस्थित विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों ने संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर अपने विचार साझा किए:​डॉ. धन सिंह रावत (शिक्षा मंत्री, उत्तराखंड सरकार): मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए घोषणा की कि उत्तराखंड के प्रत्येक जिले में एक प्राथमिक विद्यालय को मॉडल संस्कृत विद्यालय के रूप में विकसित किया जा रहा है। भविष्य में लेखक गाँव के साथ मिलकर संस्कृत के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए विशेष योजनाएं बनाई जाएंगी।​महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज: उन्होंने अपने आशीर्वचन में कहा कि संस्कृत देववाणी है और भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। लेखक गाँव की सात्विक ऊर्जा की सराहना करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि यह स्थान भविष्य में संस्कृत के एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभरेगा।​डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (संस्थापक, लेखक गाँव): कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. निशंक ने कहा कि संस्कृत भारत की सांस्कृतिक चेतना की आत्मा है। यह भाषा होने के साथ-साथ संस्कार, सामर्थ्य, अनुशासन और योग-साधना का अद्भुत केंद्र बिंदु है।​प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी (कुलपति, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय): मुख्य वक्ता के तौर पर उन्होंने कहा कि भारत के वास्तविक विकास का मार्ग संस्कृत के सूर्य से ही आलोकित होगा। उन्होंने घोषणा की कि जल्द ही देश के सभी केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयों के निदेशकों का एक महासम्मेलन लेखक गाँव में आयोजित किया जाएगा।​दीपक कुमार गैरोला (सचिव, संस्कृत शिक्षा विभाग): उन्होंने ‘श्रुति विद्या’ के माध्यम से संस्कृत को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया और आगामी वर्ष 2027 में कुंभ नगरी को “संस्कृत नगरी” के रूप में स्थापित करने का संकल्प दोहराया।​प्रो. रमाकांत पांडे (कुलपति, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय): विशिष्ट अतिथि के रूप में उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ हमें गुरु-परंपरा और आध्यात्मिक विकास की सख्त जरूरत है, जो केवल संस्कृत के संरक्षण से ही संभव है।

​ऐतिहासिक एम.ओ.यू. और विशिष्ट उपलब्धियां

​इस गोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (नई दिल्ली), उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय (हरिद्वार), उत्तराखंड संस्कृत अकादमी, लेखक गाँव और स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के बीच बहुआयामी एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर होना रहा। इसके साथ ही, ज्ञान के विस्तार के लिए “वेद और विश्व शांति” विषय पर एक विशेष ‘उत्कृष्टता केंद्र’ (Center of Excellence) का भी उद्घाटन किया गया।

​समारोह के अंतिम चरण में सभी सम्मानित अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. राकेश सुंदरियाल ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. सुशील उपाध्याय द्वारा किया गया। इस ऐतिहासिक पहल से उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि संपूर्ण देश में संस्कृत के पुनरुत्थान को एक नई और प्रभावी दिशा मिलेगी।

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