संस्कृत, पाली और प्राकृत के वैश्विक प्रचार के लिए उत्तराखंड और महाराष्ट्र आए साथ: पुणे यूनिवर्सिटी में उच्च स्तरीय बैठक
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संस्कृत, पाली और प्राकृत के वैश्विक प्रचार के लिए उत्तराखंड और महाराष्ट्र आए साथ: पुणे यूनिवर्सिटी में उच्च स्तरीय बैठक
पुणे:
संस्कृत और प्राच्य भाषाओं को न केवल देश में बल्कि वैश्विक पटल पर पुनर्जीवित और प्रसारित करने के उद्देश्य से उत्तराखंड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने हाल ही में पुणे का महत्वपूर्ण दौरा किया। अपने इस दौरे के दौरान उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी (SPPU) के कुलपति प्रो. सुरेश गोसावी और उप-कुलपति प्रो. पराग कालकर के साथ-साथ संस्कृत, प्राकृत और पाली विभागों के विभागाध्यक्षों व प्राध्यापकों से विस्तृत मुलाकात की। बैठक का मुख्य बिंदु यह रहा कि संस्कृत भाषा को पूरे भारत और दुनिया भर में एक व्यावहारिक और व्यापक भाषा के रूप में कैसे स्थापित किया जाए।
इस उच्च स्तरीय वार्ता में पुणे यूनिवर्सिटी सहित महाराष्ट्र के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा संस्कृत को एक भाषा और एक विषय दोनों रूपों में बढ़ावा देने के प्रयासों की समीक्षा की गई।
महाराष्ट्र में तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत का प्रस्ताव
बैठक में संस्कृत और प्राकृत भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. दिवाकर मोहंती, संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. देवनाथ त्रिपाठी और कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय (KKSU), रामटेक के डीन प्रो. हरेकृष्ण अगस्ती ने संस्कृत की वर्तमान स्थिति पर गहन विचार-विमर्श किया।
चर्चा के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि महाराष्ट्र की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए ‘प्राक्-शास्त्री’ की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए शासन स्तर पर उचित सरकारी प्रस्ताव (GRs) पारित करने की आवश्यकता जताई गई। वार्ता के दौरान पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़े ‘मंत्र चिकित्सा’ और ‘प्रज्ञाचक्षु’ जैसे विशिष्ट एवं शोधपरक विषयों पर भी विचार साझा किए गए।
पाली, प्राकृत और संस्कृत के अंतर्संबंधों पर मंथन
उत्तराखंड के संस्कृत शिक्षा सचिव ने SPPU के पाली और बौद्ध अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्षों तथा प्राध्यापकों—प्रो. महेश देवकर, डॉ. प्रवीण तलत, डॉ. तृप्तिरानी तायडे, डॉ. दीपाली पाटिल, डॉ. प्रणाली वैनगंकर, डॉ. मृगेंद्र प्रताप, डॉ. जयकर और सी-डैक (C-DAC) की तकनीकी टीम के साथ भी एक महत्वपूर्ण बैठक की।
इस दौरान संस्कृत, पाली और प्राकृत भाषाओं के आपसी ऐतिहासिक संबंधों, उत्पत्ति और उनके विकास क्रम पर विस्तार से चर्चा हुई। यह तथ्य भी रेखांकित किया गया कि कई प्राचीन संस्कृत और पाली ग्रंथ जो मूल रूप से भारत में रचे और पढ़े गए थे, कालांतर में दुनिया के अन्य हिस्सों में लोकप्रिय हुए और अब वे पुन: भारत में शोध का केंद्र बन रहे हैं।
भाषा और तकनीक का संगम: C-DAC और पाली विभाग की पहल
पुणे यूनिवर्सिटी का पाली विभाग वर्तमान में 12 अकादमिक पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसमें लगभग 200 छात्र नामांकित हैं। इस विभाग की ख्याति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहाँ कई देशों के विदेशी छात्र भी अध्ययन और अनुसंधान के लिए आते हैं।
बैठक में भाषा और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर विशेष ध्यान दिया गया:अनुवाद प्रणाली (Translation System): C-DAC की टीम पाली विभाग के साथ मिलकर एक उन्नत ट्रांसलेशन सिस्टम विकसित कर रही है।पाली शब्दकोश परियोजना: विभाग में एक वृहद पाली डिक्शनरी प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, जिसके तहत अब तक 10 वॉल्यूम प्रकाशित किए जा चुके हैं।समृद्ध पुस्तकालय: विश्वविद्यालय की सुव्यवस्थित लाइब्रेरी और दुर्लभ पांडुलिपियों व ग्रंथों का संग्रह इस बात का प्रमाण है कि यहाँ प्राच्य विद्याओं का संरक्षण मुस्तैदी से किया जा रहा है।
अंत में, इस बात पर सहमति बनी कि संस्कृत के साथ-साथ बौद्ध अध्ययन और पाली के बीच तुलनात्मक अनुसंधान (Comparative Research) समय की आवश्यकता है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र के शिक्षाविदों के बीच हुई यह उत्पादक चर्चा संस्कृत और संबंधित भाषाओं के पुनरुत्थान के लिए एक नया रोडमैप तैयार करने में मददगार साबित होगी।
