हेमवती नंदन बहुगुणा: पहाड़ का वह शिखर पुरुष, जिसने अपनी राजनीति से देश को दी नई दिशा
1 min read


हेमवती नंदन बहुगुणा: पहाड़ का वह शिखर पुरुष, जिसने अपनी राजनीति से देश को दी नई दिशा
देहरादून: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने आज उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज राजनेता स्वर्गीय श्री हेमवती नंदन बहुगुणा की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्यमंत्री आवास में आयोजित एक सादगीपूर्ण कार्यक्रम में सीएम धामी ने बहुगुणा जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनके दूरदर्शी नेतृत्व और जनहित के प्रति उनके समर्पण को याद किया।
मुख्यमंत्री ने कहा, “हेमवती नंदन बहुगुणा जी एक कुशल प्रशासक और जननायक थे। उनका जीवन दर्शन समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित रहा। उनके द्वारा किए गए कार्य आज भी राजनीतिज्ञों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।”
संघर्षों से भरा जीवन और प्रारंभिक काल
हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के बुघाणी गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई, लेकिन उनका जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान रहा। अपनी उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) का रुख किया, जो उस समय भारतीय राजनीति का केंद्र था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही वे छात्र राजनीति में सक्रिय हुए और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की मशाल थाम ली। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन पर भारी इनाम रखा था। वे कई बार जेल गए, लेकिन उनके संकल्प को डिगाया नहीं जा सका।
मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल और ऐतिहासिक निर्णय
बहुगुणा जी को ‘हिमालय पुत्र’ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 8 नवंबर 1973 से 29 नवंबर 1975 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल छोटा जरूर था, लेकिन वह निर्णयों और विकास की दृष्टि से बहुत बड़ा था।
- कुशल प्रशासक: उन्हें फाइलों को तुरंत निपटाने और जनता की समस्याओं को सीधे सुनने के लिए जाना जाता था। उनके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में औद्योगिक और कृषि विकास के नए आयाम स्थापित हुए।
- पर्वतीय क्षेत्रों की चिंता: वे पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश में पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए अलग से बजट और विभाग की आवश्यकता पर जोर दिया। आज उत्तराखंड राज्य की जो नींव है, उसमें बहुगुणा जी की दूरगामी सोच का बड़ा योगदान है।
- राजनीतिक शुचिता: वे सिद्धांतों की राजनीति करते थे। चाहे केंद्र में कैबिनेट मंत्री (संचार, वित्त और पेट्रोलियम विभाग) के रूप में उनकी भूमिका हो या मुख्यमंत्री के रूप में, उन्होंने सदैव पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोपरि रखा।
जीवन दर्शन: “लोकतंत्र और जनसेवा”
बहुगुणा जी का जीवन दर्शन पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था। वे मानते थे कि सत्ता केवल जनता की सेवा का एक माध्यम है।
- गरीबों के मसीहा: वे दलितों, पिछड़ों और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज थे।
- सत्यनिष्ठा: इंदिरा गांधी से मतभेदों के बावजूद, उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता से कभी समझौता नहीं किया। आपातकाल के दौरान और उसके बाद भी उनकी राजनीति ने देश को यह सिखाया कि लोकतंत्र में संवाद और असहमति का क्या महत्व है।
- शिक्षा के प्रति लगाव: उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण संस्थानों की नींव रखने में मदद की।
एक अमर विरासत
हेमवती नंदन बहुगुणा का जाना भारतीय राजनीति के एक अध्याय का अंत था, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनकी बेटी रीता बहुगुणा जोशी और पुत्र विजय बहुगुणा (उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री) ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। आज की नई पीढ़ी के नेताओं के लिए बहुगुणा जी का जीवन यह संदेश देता है कि संघर्ष ही नेतृत्व की सबसे बड़ी पाठशाला है।
