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प्रयागराज: मांडा में रफ्तार का कहर, तेंदुए की मौत ने खोल दी वन विभाग के दावों की पोल

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प्रयागराज: मांडा में रफ्तार का कहर, तेंदुए की मौत ने खोल दी वन विभाग के दावों की पोल

प्रयागराज, 02 अप्रैल 2026: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के मांडा इलाके से एक विचलित करने वाली घटना सामने आई है, जहाँ सड़क पार करते समय एक अज्ञात वाहन की टक्कर से एक वयस्क तेंदुए की मौके पर ही मौत हो गई। यह हादसा न केवल रफ्तार के जुनून को दर्शाता है, बल्कि उत्तर प्रदेश वन विभाग की कार्यप्रणाली और वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

हादसे का विवरण और मौके की स्थिति

​घटना मांडा थाना क्षेत्र की है, जहाँ देर रात एक तेंदुआ जंगल से निकलकर सड़क पार कर रहा था। इसी दौरान एक अज्ञात तेज रफ्तार वाहन ने उसे जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि तेंदुए ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। सुबह होते ही जब राहगीरों ने सड़क पर तेंदुए का शव देखा, तो इलाके में हड़कंप मच गया और देखते ही देखते तमाशबीनों का जमावड़ा लग गया। सूचना मिलने पर पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुँची। डॉक्टरों की टीम ने प्रारंभिक जांच के बाद तेंदुए की मौत की आधिकारिक पुष्टि की और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

वन विभाग की लापरवाही: जवाबदेही किसकी?

​इस हादसे ने वन विभाग के प्रबंधन और स्थानीय रेंजरों की जवाबदेही पर बड़े सवाल उठाए हैं। आखिर रिहायशी इलाकों और सड़कों पर जंगली जानवरों की आमद को रोकने के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए?फेंसिंग का अभाव: क्या संवेदनशील क्षेत्रों में फेंसिंग का उचित इंतजाम नहीं किया गया था?​स्पीड ब्रेकर और स्पीडोमीटर: वन्यजीव बहुल क्षेत्रों से गुजरने वाली सड़कों पर वाहनों की गति नियंत्रित करने के लिए स्पीड ब्रेकर या स्पीडोमीटर का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है?​गश्त और मॉनिटरिंग: क्या फॉरेस्ट रेंजर और संबंधित अधिकारियों को समय-समय पर गश्त और ‘ट्रैकिंग’ के निर्देश नहीं हैं?

वाइल्डलाइफ कॉरिडोर और सड़क नियोजन पर सवाल

​सड़कों का निर्माण करते समय अक्सर वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस क्षेत्र में कॉरिडोर या अंडरपास की अनुपलब्धता इस बात का प्रमाण है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की कमी है। अगर यहाँ सुरक्षित रास्ता होता, तो शायद इस बेजुबान की जान बच सकती थी।

क्या होगी कार्रवाई?

​सूत्रों के अनुसार, प्रदेश सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से तेंदुए को लगी चोट की तीव्रता और संभवतः वाहन के प्रकार का भी अंदाजा लगाया जा सकेगा।​वाहन चालक पर शिकंजा: पुलिस अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर उसकी तलाश कर रही है।​विभागीय जांच: क्या संबंधित फॉरेस्ट रेंजर या बीट इंचार्ज के खिलाफ लापरवाही बरतने पर कार्रवाई की जाएगी? यह एक बड़ा सवाल है।

​जंगली जानवरों का सड़कों पर आना केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि वाहन चालकों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। यह घटना शासन-प्रशासन के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। जब तक संवेदनशील क्षेत्रों में गति सीमा का सख्ती से पालन और सुरक्षित कॉरिडोर का निर्माण नहीं होगा, तब तक ऐसे ‘ऑपरेशन प्रहार’ जैसे अभियानों के बीच बेकसूर वन्यजीवों की बलि चढ़ती रहेगी।

उत्तर प्रदेश में नेशनल पार्क

​उत्तर प्रदेश में आधिकारिक रूप से केवल एक नेशनल पार्क है:​दुधवा नेशनल पार्क (लखीमपुर खीरी): यह भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है और बाघों, गैंडों व बारहसिंगा के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।

​हालांकि, राज्य में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं:​4 टाइगर रिजर्व: दुधवा, पीलीभीत, अमानगढ़ (बिजनौर) और रानीपुर (चित्रकूट – राज्य का सबसे नया टाइगर रिजर्व)।​हस्तिनापुर वन्यजीव अभयारण्य: यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा संरक्षित क्षेत्र है।

2. तेंदुओं की संख्या (Leopard Population)

​उत्तर प्रदेश में तेंदुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है:​ताजा आंकड़े: वर्ष 2024-25 की गणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में तेंदुओं की अनुमानित संख्या 1,100 से अधिक हो सकती है (भारत में कुल तेंदुओं की संख्या लगभग 13,874 है)।​प्रभावित क्षेत्र: बिजनौर, बहराइच, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत जिलों में तेंदुओं की घनी आबादी है। बिजनौर में तो गन्ने के खेतों को तेंदुए अपना “नर्सरी” (प्रजनन स्थल) बना चुके हैं।

3. वन्यजीव सुरक्षा के लिए वन विभाग के कदम

​बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष और जानवरों की सुरक्षा के लिए विभाग ने 2026 में कई आधुनिक कदम उठाए हैं:​तेंदुओं की नसबंदी (Sterilization): उत्तर प्रदेश सरकार महाराष्ट्र मॉडल की तर्ज पर बिजनौर से तेंदुओं की नसबंदी का ट्रायल शुरू करने जा रही है। इसका उद्देश्य आबादी को नियंत्रित कर संघर्ष कम करना है।​लेपर्ड सफारी का निर्माण: पकड़े गए हिंसक तेंदुओं को रखने के लिए गोंडा और इटावा में लेपर्ड सफारी विकसित की जा रही है।​एंटी-पोचिंग और तकनीक: * जंगलों में CCTV कैमरों और ड्रोन से 24×7 निगरानी की जा रही है।​सोनभद्र जैसे इलाकों में सुरक्षा गार्डों की संख्या बढ़ाई गई है।​वाटरहोल और फायर कंट्रोल: गर्मी के मौसम में जानवरों को पानी के लिए बाहर न आना पड़े, इसके लिए जंगलों के भीतर नए वॉटरहोल बनाए गए हैं। साथ ही, वनाग्नि रोकने के लिए 116 फायर कंट्रोल सेल स्थापित किए गए हैं।​डॉल्फिन मित्र: गंगा में डॉल्फिनों की सुरक्षा के लिए स्थानीय समुदायों को ‘डॉल्फिन मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। उत्तर प्रदेश में वर्तमान में डॉल्फिनों की संख्या लगभग 2,397 है, जो देश में सर्वाधिक है। ​त्वरित प्रतिक्रिया टीम (RRT): जानवरों के रिहायशी इलाकों में आने पर उन्हें सुरक्षित रेस्क्यू करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित टीमें तैनात की गई हैं।

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