नर्सिंग एकता मंच का संघर्ष: 139 दिनों से जारी आंदोलन , आमरण अनशन की उठी गूँज
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नर्सिंग एकता मंच का संघर्ष: 139 दिनों से जारी आंदोलन , आमरण अनशन की उठी गूँज
देहरादून, उत्तराखंड उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले नर्सिंगकर्मी आज अपने अस्तित्व और भविष्य की रक्षा के लिए सड़कों पर हैं। नर्सिंग एकता मंच के बैनर तले चल रहा यह आंदोलन अब एक निर्णायक और संवेदनशील मोड़ पर पहुँच गया है। आज इस धरने को 139 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन सरकार की ओर से ठोस आश्वासन न मिलने के कारण अब यह आंदोलन अनिश्चितकालीन आमरण अनशन में तब्दील हो गया है। आज अनशन का चौथा दिन है और धरना स्थल पर तनाव के साथ-साथ संकल्प की एक अटूट लौ दिखाई दे रही है।
वर्षवार भर्ती की मांग: हक की लड़ाई
नर्सिंगकर्मियों की मुख्य मांग ‘वर्षवार भर्ती’ प्रक्रिया को लागू करना है। इनका तर्क है कि लंबे समय से सेवाएँ देने और अपनी बारी का इंतज़ार करने वाले अनुभवी नर्सिंगकर्मियों के साथ न्याय तभी होगा जब वरिष्ठता के आधार पर नियुक्तियाँ की जाएँगी। नर्सिंग एकता मंच का कहना है कि यह केवल रोजगार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के उन हजारों युवाओं के सम्मान की लड़ाई है जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को संभाला है।
आमरण अनशन पर डटे ‘स्वास्थ्य प्रहरी’
आंदोलन को धार देने के लिए अब नर्सिंगकर्मी अपने शरीर को गलाने को तैयार हैं। अनशन स्थल पर बैठी नर्सिंगकर्मियों की स्थिति अब चिंताजनक होने लगी है, लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं:स्तुति सती (प्रदेश प्रवक्ता): नेहरू ग्राम निवासी 38 वर्षीय स्तुति सती के अनशन का आज चौथा दिन है। मंच की मुख्य आवाज होने के नाते वे न केवल खुद अनशन पर हैं, बल्कि अन्य साथियों का मनोबल भी बढ़ा रही हैं।विमला: पिथौरागढ़ की रहने वाली 34 वर्षीय विमला आज अपने अनशन के तीसरे दिन में प्रवेश कर चुकी हैं। पहाड़ की दुर्गम परिस्थितियों से निकलकर अपनी मांगों के लिए वे अडिग हैं।शिरा बंधानी: टिहरी गढ़वाल के ग्राम नकोट की निवासी 40 वर्षीय शिरा बंधानी के अनशन का आज दूसरा दिन है। एक गृहिणी और नर्सिंगकर्मी के रूप में उनका यह संघर्ष समाज के लिए एक मिसाल है।राजेश कुमार शर्मा: भानियावाला निवासी 36 वर्षीय राजेश कुमार शर्मा ने आज से अपने अनशन का पहला दिन शुरू किया है। वे इस आंदोलन में पुरुष नर्सिंगकर्मियों की एकजुटता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
139 दिनों का धैर्य और व्यवस्था की बेरुखी
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 139 दिन तक शांतिपूर्ण धरना देना धैर्य की पराकाष्ठा है। सर्दी, गर्मी और अब बदलती ऋतुओं के बीच ये नर्सिंगकर्मी केवल एक ही उम्मीद में डटे हैं कि सरकार उनकी सुध लेगी। धरना स्थल अब केवल एक विरोध प्रदर्शन का केंद्र नहीं, बल्कि इन नर्सिंगकर्मियों के साझा दुखों और संघर्षों का घर बन गया है।
अफ़सोस की बात यह है कि जो हाथ मरीजों को जीवनदान देते थे, आज उन्हीं हाथों में विरोध की तख्तियाँ हैं और उनके शरीर अन्न के एक-एक दाने के लिए तरस रहे हैं। मंच के पदाधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि – “जब तक मांगों पर कोई शासनादेश या उचित निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आमरण अनशन जारी रहेगा।”
स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभाव और सामाजिक सरोकार
नर्सिंगकर्मियों का यह आंदोलन केवल उनके व्यक्तिगत हित तक सीमित नहीं है। यदि राज्य के अनुभवी नर्सिंगकर्मी इस तरह सड़कों पर रहेंगे, तो अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ना स्वाभाविक है। आम जनता भी अब इस आंदोलन के प्रति सहानुभूति रख रही है, क्योंकि लोग जानते हैं कि संकट के समय ये नर्सिंगकर्मी ही अग्रिम पंक्ति के योद्धा बनकर खड़े रहते हैं।
139वां दिन और आमरण अनशन का चौथा दिन उत्तराखंड सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अनशनकारियों का गिरता स्वास्थ्य किसी भी समय बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता है। नर्सिंग एकता मंच ने अपनी ओर से स्पष्ट कर दिया है कि वे पीछे नहीं हटेंगे। अब गेंद शासन और प्रशासन के पाले में है। क्या सरकार इन ‘स्वास्थ्य प्रहरियों’ की जायज मांगों को मानकर इस गतिरोध को समाप्त करेगी, या यह संघर्ष और भी उग्र रूप धारण करेगा?
यह समय केवल आंकड़ों और फाइलों का नहीं, बल्कि उन चेहरों को देखने का है जो अपनी जान जोखिम में डालकर ‘वर्षवार भर्ती’ के अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं। देवभूमि की जनता की नजरें अब सचिवालय की ओर टिकी हैं, जहाँ से इनके भविष्य का फैसला होना है।
