बागेश्वर : आधुनिक कृषि और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ से स्वरोजगार का गढ़ बन रहा बागेश्वर
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बागेश्वर : आधुनिक कृषि और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ से स्वरोजगार का गढ़ बन रहा बागेश्वर
विशेष रिपोर्ट: साउथ एशिया 24×7
बागेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के लिए ‘पलायन’ दशकों से एक अभिशाप बना हुआ था, लेकिन अब बागेश्वर जनपद इस धारणा को तेजी से बदल रहा है। सुदूर गांवों में खाली पड़े खेतों में अब फिर से हरियाली लौट रही है और इसका श्रेय जाता है ‘रिवर्स माइग्रेशन’ को। जिले के युवा अब शहरों की नौकरी छोड़ अपनी माटी की ओर लौट रहे हैं और आधुनिक तकनीक के सहारे आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहे हैं।
जिलाधिकारी की पहल और विभागीय समन्वय
जिलाधिकारी आकांक्षा कोंड़े के कुशल नेतृत्व में बागेश्वर प्रशासन ने किसानों और युवाओं को सीधे विभागीय योजनाओं से जोड़ने का अभियान चलाया है। उद्यान, कृषि और मत्स्य विभाग के साझा प्रयासों से अब सरकारी योजनाएं फाइलों से निकलकर खेतों तक पहुँच रही हैं। किसानों को पॉलीहाउस, मत्स्य पालन और आधुनिक कृषि उपकरणों पर 80 से 90 प्रतिशत तक का भारी अनुदान दिया जा रहा है, जिससे खेती अब घाटे का सौदा नहीं बल्कि एक मुनाफे वाला व्यवसाय बन गई है।
सफलता की गाथा: मनोज और चंद्रशेखर बने प्रेरणा पुंज
जिले के सलीगांव निवासी मनोज कोरंगा उन युवाओं के लिए रोल मॉडल बनकर उभरे हैं जो रोजगार की तलाश में बाहर जाना चाहते हैं। मनोज ने एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाकर अपने गांव में 3 पॉलीहाउस और 3 मत्स्य तालाब स्थापित किए हैं। साथ ही एक खाद्य प्रसंस्करण इकाई भी लगाई है। वे न केवल सालाना 3 से 4 लाख रुपये कमा रहे हैं, बल्कि 4-5 स्थानीय लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं।
इसी तरह गरुड़ ब्लॉक के चंद्रशेखर पांडे ने पारंपरिक खेती से हटकर औषधीय खेती में हाथ आजमाया है। 2 हेक्टेयर भूमि पर तुलसी, लेमनग्रास और अश्वगंधा उगाकर उन्होंने ‘हिम नेचुरल’ जैसा अपना ब्रांड खड़ा किया है। आज उनकी वार्षिक आय 8 लाख रुपये के करीब पहुँच गई है, जो यह साबित करता है कि अगर सही दिशा में प्रयास हो तो पहाड़ का पानी और जवानी दोनों यहीं काम आ सकते हैं।
कीवी उत्पादन और जड़ी-बूटी: बागेश्वर की नई पहचान
आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बागेश्वर में कृषि का स्वरूप बदल गया है। साल 2022-23 तक जहां कीवी की खेती मात्र 5-8 हेक्टेयर में सिमटी थी, वह अब बढ़कर 80 हेक्टेयर हो गई है। कीवी का उत्पादन 110 क्विंटल से उछलकर 1100 क्विंटल के पार पहुँच गया है। इससे किसानों की सामूहिक आय जो कभी 14 लाख रुपये थी, अब 1.7 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। इसके अलावा 46 हेक्टेयर में फैली ‘कुटकी’ की खेती से 350 महिलाएं लगभग 70 लाख रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।
महिला सशक्तिकरण: हंसी शाह का ‘ग्रीन रेवोल्यूशन’
मन्यूड़ा गांव की हंसी शाह ने वैज्ञानिक खेती को अपनाकर यह साबित कर दिया कि पहाड़ की महिलाएं भी उद्यमी बन सकती हैं। 38 नाली भूमि पर मोटे अनाज और सब्जियों के दम पर वे सालाना 5 लाख रुपये कमा रही हैं। सबसे सुखद पहलू यह है कि वे अब 40 अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार की राह दिखा रही हैं।
बागेश्वर में आधुनिक कृषि उपकरणों का प्रयोग, वर्मी कंपोस्ट का बढ़ता चलन और लागत में कमी आने से उत्पादन में 30-40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पलायन के वीराने को चीरकर ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की यह लहर उत्तराखंड के अन्य जनपदों के लिए भी एक मिसाल पेश कर रही है।
