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Ganga-Jamuni Tehzeeb: संगम नगरी में सौहार्द की अनूठी मिसाल, रमजान में रोजा रखकर देवी माँ की चुनरी बना रहे सैकड़ों मुस्लिम परिवार

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Ganga-Jamuni Tehzeeb: संगम नगरी में सौहार्द की अनूठी मिसाल, रमजान में रोजा रखकर देवी माँ की चुनरी बना रहे सैकड़ों मुस्लिम परिवार

प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज हमेशा से अपनी ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के लिए विश्व विख्यात रही है। वर्तमान में जहाँ एक ओर पवित्र रमजान माह की इबादत चल रही है, वहीं दूसरी ओर यहाँ के मुस्लिम परिवार हिंदू आस्था के प्रतीक चैत्र नवरात्रि के लिए पूरी शिद्दत से तैयारियों में जुटे हैं। शहर से करीब 60 किलोमीटर दूर लालगोपालगंज कस्बे में मुस्लिम समुदाय के सैकड़ों परिवार देवी माँ के दरबार में चढ़ने वाली चुनरी, कलावा और रामनामी तैयार कर रहे हैं, जो सामाजिक समरसता की एक मिसाल पेश करता है।

4 पीढ़ियों से जारी है आस्था का यह सफर

​लालगोपालगंज और आसपास के आधा दर्जन गाँवों में रंगरेज बिरादरी से जुड़े मुस्लिम परिवार दशकों से इस काम को कर रहे हैं। इनके लिए यह केवल एक कारोबार नहीं, बल्कि पुरखों से मिली एक विरासत है।

  • रोजा और भक्ति का संगम: वर्तमान में रमजान का महीना चल रहा है। यहाँ के कारीगर भीषण गर्मी में रोजा रखकर पूरी पवित्रता और श्रद्धा के साथ माता की चुनरी पर रंग चढ़ाते हैं और कलावा तैयार करते हैं।
  • हजारों परिवारों की आजीविका: कारीगर मोहम्मद ताहिर बताते हैं कि उनके कस्बे के आसपास लगभग 2000 मुस्लिम परिवार इस कार्य से जुड़े हैं। उनके मुताबिक, “यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे हाथों की बनी चुनरी माँ के दरबार में चढ़ती है।”

विंध्याचल से लेकर मैहर तक पहुँचती है यहाँ की चुनरी

​लालगोपालगंज के कारीगरों के हाथों का हुनर केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं है। यहाँ की बनी चुनरी और रामनामी की चमक देश के कई प्रसिद्ध शक्तिपीठों में देखने को मिलती है:

  1. विंध्याचल धाम (मिर्जापुर)
  2. मैहर देवी (मध्य प्रदेश)
  3. धर्मनगरी वाराणसी और अयोध्या
  4. चित्रकूट के पावन मंदिर

​इन प्रसिद्ध मंदिरों के अलावा प्रदेश के कोने-कोने से व्यापारी नवरात्रि से पहले ही यहाँ ऑर्डर बुक करा लेते हैं, क्योंकि यहाँ की रंगाई और कलावे की गुणवत्ता को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

“नफरत की खाई को पाटता हुनर”

​कारीगर रज्जब का कहना है कि वे इन पूजा सामग्रियों को उसी श्रद्धा से बनाते हैं, जिस श्रद्धा से एक हिंदू भक्त इसे माँ के चरणों में अर्पित करता है। देश के कुछ हिस्सों में भले ही सांप्रदायिक तनाव की खबरें आती हों, लेकिन लालगोपालगंज के ये रंगरेज अपनी मेहनत और मोहब्बत के रंगों से समाज की नफरत की खाई को पाटने का काम कर रहे हैं।

व्यापारिक महत्व: नवरात्रि का रहता है इंतज़ार

​कारीगरों के लिए नवरात्रि का समय साल का सबसे बड़ा बिजनेस सीजन होता है। इस दौरान मांग इतनी अधिक होती है कि घर के बच्चे और महिलाएं भी इस काम में हाथ बँटाते हैं। चुनरी की छपाई से लेकर कलावे की बुनाई तक, हर काम में एक विशेष निपुणता की आवश्यकता होती है, जो इन परिवारों के रग-रग में बसी है।

निष्कर्ष: यही है असली भारत

​प्रयागराज की यह तस्वीर उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करते हैं। जब एक मुस्लिम कारीगर रोजा रखकर माँ की चुनरी तैयार करता है और एक हिंदू भक्त उसे श्रद्धा से शीश नवाता है, तब ‘अनेकता में एकता’ का भारतीय मंत्र सच साबित होता है।

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